कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तम लम्बक ७१ उसके स्वीकार करने पर दूसरे दिन निश्चयदत्त विद्याधरी की गोद में बैठकर उस बन्दर वाले वन में गया ॥१९४॥ वन में बन्दर-रूप उस मित्र को प्रिया के साथ प्रणाम करके निश्चयदत्त ने उसका कुशल- क्षेमंक पूछा ॥१९५॥ बन्दर ने कहा—'आज मेरा कुशल ही है कि तू अनुरागपरा के साथ मुझसे मिला' ऐसा कहकर बन्दर रूप सोमस्वामी ने निश्चयदत्त को बधाई दी और उसकी पत्नी को आशीर्वाद दिया। तदनन्तर वे सब एक पत्थर की सुन्दर चट्टान पर बैठ गये ॥१९६-१९७॥ वहीं बैठकर वे उस बन्दर के लिए चर्चा करने लगे जैसा कि निश्चयदत्त ने पहले ही अपनी पत्नी से कहा था ॥१९८॥ तदनन्तर अपनी प्रेयसी की गोद में बैठा हुआ निश्चयदत्त बन्दर से आज्ञा लेकर अपनी पत्नी के नवनिर्मित भवन में लौट गया ॥१९९॥ दूसरे दिन निश्चयदत्त ने फिर कहा— आओ उस बन्दर-मित्र के पास आज फिर चलें। तब अनुरागपरा बोली—'आज तुम स्वयं जाओ। मुझ से उड़ने और उतरने की विद्या ले लो ॥२००-२०१॥ उसके ऐसा कहने पर वह निश्चयदत्त विद्याधरी से दोनों विद्याएँ प्राप्त करके आकाश में उड़कर उस मित्र बन्दर के पास आया ॥२०२॥ इधर जब वह अपने मित्र के साथ बैठकर गप-शप कर रहा था उधर अनुरागपरा घर से निकल बाग में आई। जब वह बाग में बैठी थी तब उसपर आकाश से उड़ता हुआ एक विद्याधर कुमार घूमता हुआ उधर आ निकला। वहाँ पर अनुरागपरा को देखकर काम के आवेश में आ गया और उसे मनुष्य-पतिवाली विद्याधरी जानकर उसके समीप आया ॥२०३-२०५॥ उस विद्याधरी ने भी उस सुन्दर विद्याधर-युवक को पास आये देखकर नीचे मुँह किये हुए कौतुक से पूछा—'तू कौन है और क्यों आया है' ॥२०६॥ तब वह बोला— हे सुन्दरी ! मुझे अपनी विद्याओं के ज्ञानवाला राजभंजन नामक विद्याधर समझो ॥२०७॥ मृगनयनी ! यह मैं तुझे देखकर कामदेव द्वारा वश में करके तुझको समर्पित कर दिया गया हूँ ॥२०८॥