कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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Read in contextदशम लम्बक ९५ इस प्रकार कहते हुए शियार से वह गधा बोला—'सदा अपने धोबी के बोझ ढोते-ढोते दुर्बल हो गया हूँ। इस प्रकार कहते हुए गधे से सियार ने कहा—॥१३३॥ 'यहाँ क्यों कष्ट उठा रहे हो भाम्रो। मैं तुम्हें स्वर्ग के समान सुख पहुँचानेवाले वन में पहुँचा देता हूँ। वहाँ तुम गधियों के साथ हृष्ट-पुष्ट हो जाओगे' ॥१३४॥ यह सुनकर भोग का लोभी वह गधा सियार की बात स्वीकार कर उसके साथ सिंह के वन को चला गया ॥१३५॥ गधे को देखकर उसके पीछे से आकर अस्वस्थता से दुर्बल सिंह ने उस पर अपने पंजे से आक्रमण कर दिया ॥१३६॥ इस प्रकार मार खाकर डरा हुआ गधा एकाएक भागकर चला आया और रोग से व्याकुल सिंह भी उसका पीछा न कर सका ॥१३७॥ सिंह भी अपने काम में असफल होकर शीघ्र ही अपनी गुफा में घुस गया। तब उस शियार मन्त्री ने उलाहना देते हुए सिंह से कहा—॥१३८॥ 'स्वामिन्, यदि तुम एक दुर्बल गधे को न मार सके तो हरिण आदि के मारने में तुम्हारी क्या दशा होगी' ॥१३९॥ यह सुनकर सिंह ने कहा-'तुम जैसा समझ रहे हो वैसी ही स्थिति है। अब तुम उस गधे को फिर लाओ और मैं तैयार होकर उसे मारता हूँ' ॥१४०॥ तब सिंह से फिर भेजे गये शियार ने गदहे के समीप आकर कहा-'तुम वहाँ से शीघ्र क्यों भाग आए ? ॥१४१॥ 'मुझे किसी प्राणी ने मारा' इस प्रकार कहते हुए गधे से सियार ने हँसकर कहा—॥१४२॥ 'तुम्हें व्यर्थ ही भ्रम हुआ है। वहाँ कोई ऐसा प्राणी नहीं है। मेरे जैसा ही व्यक्ति वहाँ रहता है ॥१४३॥ अत तुम मेरे साथ आओ। उस वन में निष्कंटक सुख है। इस प्रकार, उस शियार की बातों में फँसा हुआ वह मूर्ख गधा फिर वहाँ आया ॥१४४॥ उसे आते हुए देखते ही सिंह ने गुफा के मुँह से निकलकर, उसकी पीठ पर आक्रमण करके [L26: नखों से चीरकर उसे मार डाला ॥१४५॥ गधे को फाड़कर और सियार को उसका रक्षक नियुक्त करके थका हुआ सिंह नहाने के लिए चला गया ॥१४६॥ कपटी छली उस मूर्ख शियार ने अपना पेट भरने के लिए उस वध गदह के कान और हृदय को खा डाला ॥१४७॥