कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)
by महाकवि सोमदेव भट्ट
Source: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (origin)
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वज्र के समान कठोर कोढ़ी के बचन सुनकर अपनी व्याकुलता को छिपाकर वास्तविक तत्त्व जानने की इच्छा से वह कोढ़ी से बोला-॥१३८॥
'तू सचमुच कामदेव है। इसलिए, मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि तुमसे सुनकर मुझे उस स्त्री के प्रति अत्यन्त कौतूहल उत्पन्न हो गया है जो आज की रात में तुम्हारे वेष में उसके घर जाऊँ। इसलिए कृपा करो। प्रतिदिन मिलने वाली वस्तु यदि एक बार न भी मिले तो तुम्हारी क्या हानि है ? शशी के इस प्रकार कहने पर कोढ़ी ने उससे कहा—'ऐसा ही करो। मेरा वेष ले लो और अपना वेष मुझे दे दो ॥१३९—१४१॥
और, हाथ-पैरों को कपड़े से ढँककर यहाँ तबतक बैठो जबतक अँधेरा बढ़ने पर दासी आती है ॥१४२॥
मेरे भ्रम से उसके पीठ पर उठ लेने पर (अर्थात् सहारा देने पर) तू मेरे ही समान चलना। मैं पैर से रोगी होने से सदा जैसे जाता हूँ उसी तरह तुम भी जाना ॥१४३॥
कोढ़ी से इस प्रकार कहा गया शशी उसी के समान रूप में हो गया। वहाँ पर उसके दोनों साथी और कोढ़ी कुछ दूर पर जा बैठे ॥१४४॥
तदनन्तर, दासी ने आकर कोढ़ी के वेष में शशी को देखा और उसी कोढ़ी के भ्रम से बाबा —ऐसा कहकर उसने उसे अपनी पीठ का सहारा दिया ॥१४५॥
तब वह शशी रात अँधेरे में उस उसी की पत्नी के पास ले गई जो अपने कोढ़ी जार की प्रतीक्षा अँधेरे तहखाने में कर रही थी ॥१४६॥
वहाँ अन्धकार में सोवती हुई उसके शरीर के स्पर्श से उसे पहचान कर और वही उसकी स्त्री है -इस प्रकार निश्चय करके शशी विरक्त हो गया ॥१४७॥
तब उसके सो जाने पर, शशी चुपचाप बाहर निकलकर वज्रदेव और रुद्रसोम के पास आ गया और उन दोनों को अपना वृत्तान्त सुनाकर खेद के साथ बोला—'नीचा की ओर जाने- वाली चंचल स्त्रियों को धिक्कार है जो दूर से ही मनोरम प्रतीत होती हैं ॥१४८ १४९॥
गड्ढे में गिरनेवाली नदियों के समान स्त्रियां की रक्षा करना सम्भव नहीं है। देखो तहखाने में रखी हुई भी मेरी पत्नी कोढ़ी के साथ रमण करने लगी ॥१५०॥
अतः मेरे लिए भी वन ही ठीक है, घर को धिक्कार है। ऐसा कहते हुए शशी ने समान दुःख से दुःखी बनिया और ब्राह्मण के साथ वह रात बिताई ॥१५१॥
प्रातः ही वे तीनों मिलकर वन की ओर चले। सायंकाल उन्हें मार्ग में एक बावली के साथ छायादार पेड़ मिला ॥१५२॥