भारतकोश
कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

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दशम लम्बक १३३ वहाँ वे खा-पीकर रात में वृक्ष पर चढ़ गये। इतने में ही उन्होंने आकर सोये हुए एक पथिक को वृक्ष के नीचे देखा ॥१५३॥ क्षण-भर में ही उन्होंने बामली के बीच से ऊपर की ओर निकले हुए एक पुरुष को देखा जिसने अपने मुख से स्त्री के साथ एक शय्या को उगल दिया था ॥१५४॥ तब वह स्त्री के साथ समागम करके उसी शय्या पर सो गया। और, वह स्त्री सोये हुए उस पथिक के पास जाकर सो गई ॥१५५॥ रति-कार्य के अनन्तर उस पथिक से 'तुम होना कौन हो' इस प्रकार पूछी गई वह स्त्री बोली- 'मैं नागकन्या हूँ और इसकी भार्या हूँ ॥१५६॥ तुम्हें डरना न चाहिए क्योंकि मैं निन्यानब्बे पथिकों के साथ समागम कर चुकी हूँ। अब तून सौ पूरा कर दिया' ॥१५७॥ ऐसा कहती हुई उस स्त्री को और उसके नये जार को सोये हुए नाग ने उठकर डँस लिया। डँसने के उपरान्त मुँह से अग्नि की ज्वाला फेंककर उन दोनों को भस्म कर दिया ॥१५८॥ 'जहाँ शरीर के भीतर रखी हुई भी स्त्री रक्षित नहीं हो सकती वहाँ घर में तो उनकी बात ही क्या है ? ऐसी स्त्रियों को बार-बार धिक्कार है !' उस नाग के चले जाने पर इस प्रकार कहते हुए सखी आदि वे तीनों रात बिताकर वन को चले गये ॥१५९-१६०॥ वन में जाकर मैत्री आदि की चार भावनाओं को सिद्ध करके और उनके द्वारा अन्तःकरण की प्रवृत्तियों को स्थिर करके सब प्राणियों पर समान भावना रखनेवाले वे तीनों साधक अनुपम और परमानन्ददायक समाधि में मग्न होकर पूर्णसिद्धि को प्राप्त हुए और पापों का क्षय हो जाने पर मोक्ष-सिद्धि भी क्रमशः उन्होंने प्राप्त की ॥१६१॥ अपने पापों के फलस्वरूप उत्पन्न विविध कष्टों को भोगती हुई उनकी वे दुष्टा स्त्रियाँ भी द ना लोकों से भ्रष्ट होकर शीघ्र ही नष्ट हो गईं ॥१६२॥ इस प्रकार स्त्रियों में मोह (अज्ञान) के कारण होनेवाले राग (प्रेम) किसके लिए दुःख दायक नहीं होता । और, सारासार का विवेक रखनेवाले महापुरुषों का स्त्रियों के प्रति विराग मोक्ष के लिए ही होता है ॥१६३॥ पद्यवरा के समागम के लिए उत्सुक वत्सराज का पुत्र नरवाहनदत्त मन्त्रिप्रवर गोमुख द्वारा इस प्रकार चिरकाल तक मनोरञ्जन करनेवाली कथा को सुनकर धीरे-धीरे सो गया ॥१६४॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के शक्तियश लम्बक का अष्टम तरंग समाप्त

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