भारतकोश
कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)

Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation

स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा

स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished56 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 56 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

१७ देने के पश्चात्) वह नाक से धूयें को सूंघे और सब अंगों में घृत का लेन करे, मौन धारण करते हुए उससे स्पर्श हो इस प्रकार उसके पास जाने की इच्छा करे अथवा दूर से वैसा कहता हुआ खड़ा रहे। निश्चय यह प्रिय हो जायेगा और वे उसको याद करेंगे ।।११।। अथातः सांयमनं प्रतर्दनमान्तरमग्निहोत्रमित्याचक्षते यावद्वै पुरुषो भासते न तावत्प्राणितुं शक्नोति प्राण तदा वाचि जुहोति यावद्वै। ।१२ ।। अब प्रतर्दन का अनुष्ठान किया हुआ संयमन (निरोधन) कहते हैं—इसी को आन्तर अग्निहोत्र कहते हैं। मनुष्य जब तक बोलता रहता है, तब तक वह श्वास-प्रश्वास नहीं ले सकता ।।१२ ।। पुरुषः प्राणिति न तावद्भाषितुं शक्नोति वाचं तदा प्राणे जुहोत्येतेऽनन्तेऽमृताहुतीर्जाग्रच्च स्वपंश्च संततमव्यवच्छिन्नं जुहोत्यथ या अन्या ।।१३।। इस समय वह अपने वाणी में प्राण का हवन करता है और जब तक वह श्वास-प्रश्वास करता रहता है तब तक वह अपने प्राण का वाणी में हवन करता है—वह जागता हो या निद्रित हो ।।१३।। आहुतयोऽन्तवत्यस्ताः कर्ममय्यो भवन्त्येतद्ध वै पूर्वे विद्वांसोऽग्निहोत्रं जुहवांचक्रुः ।।१४ ।। यह कभी न समाप्त होने वाली अखण्ड आहुतियाँ बराबर हुआ करती हैं। सामान्य आहुतियाँ अन्त वाली होती हैं क्योंकि वे कर्म रूप हैं। प्राचीन काल के विद्वान् लोग इस अग्निहोत्र को करते थे ।।१४।। उक्थं ब्रह्मेति ह स्माह शुष्कभृंगारस्तदृगित्युपासीत सर्वाणि हास्मै भूतानि श्रैष्ठ्यायाभ्यर्च्चन्ते तद्यजुरित्युपासीत सर्वाणि हास्मै भूतानि श्रैष्ठ्याय युज्यन्ते तत्सामेत्युपासीत ।।१५।।