कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् (हिन्दी अनुवाद सहित)
Kaushitaki Brahmana Upanishad with Hindi Translation
स्वामी महेश्वरानन्द गिरि द्वारा
स्रोत: मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली · मेहता चैरिटेबल ट्रस्ट दिल्ली (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ उक्थ ब्रह्म है, ऐसा शुष्क भृङ्गार ने कहा है। यह उक्थ और ऋक् एक ही है ऐसा समझ कर उसका मनन करे। सब प्राणी उसी को श्रेष्ठ मानकर उसकी ही अर्चना करते हैं। वह और यजुर्वेद एक ही है ऐसा समझ कर उसका मनन करे ।।१५ ।। सर्वाणि हास्मै भूतानि श्रेष्ठ्याय सन्नमन्ते तच्छ्रीरित्युपासीत तद्यश इत्युपासीत त्त्तेज इत्युपासीत तद्यथैतच्छास्त्राणां श्रीमत्तमं यशस्वितमं ।।१६ ।। प्राणी उसी को श्रेष्ठ मान के उसका योग करते हैं (ध्यान करते हैं)। वह और साम एक ही है ऐसा समझ कर उसका मनन करे। समस्त प्राणी उसको श्रेष्ठ मानकर उसको नमस्कार करते हैं। यह और ऐश्वर्य एक ही है, ऐसा ध्यान करे, यह और यश एक ही है ऐसा ध्यान करे। यह और तेज एक ही है ऐसा ध्यान करे ।।१६ ।। तेजस्वितमं भवति तथा एवैवं विद्वान्सर्वेषां भूतानां श्रीमत्तमो यशस्वितमस्तेजस्वितमो भवति तमेतमैष्टकं कर्ममयमात्मान- मध्वर्युः संस्करोति तस्मिन्यजुर्मयं प्रवयति यजुर्मयं ऋङ्मये साममयमुद्गाता स एष सर्वस्यै त्रयीविद्याया आत्मैष उ एवास्यात्मा एतदात्मा भवति य एवं वेद ।।१७ ।। जिस प्रकार धनुष सब शस्त्रों में अत्यन्त श्रीयुक्त और अत्यन्त तेजस्वी होता है उसी प्रकार यह जानने वाला मनुष्य समस्त प्राणियों में अत्यन्त श्रीयुक्त, अत्यंत यशस्वी और अत्यंत तेजस्वी होता है। कर्म का साधन रूप समिधां से प्रज्वलित अग्नि ही वह स्वयं है ऐसा अध्वर्यु मानता है और वह यज्ञ का यजुर्भाग उसमें प्रवेश कराता है। होता यजुर्भाग में ऋग् भाग का प्रवेश कराता है। उद्गाता ऋग् भाग में साम भाग का प्रवेश कराता है, वही त्रयी विद्या का आत्मा है, सचमुच वही उसका आत्मा है—यह जो जानता है वह वही हो जाता है ।।१७।।