भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

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( ७ ) कं. सूत्र पृष्ठ यक्ष के उपद्रव, गीदड़ के बोलने आपस के झगड़ने, २२३-२५१ ग्रहणों, उषा, दुर्भिक्ष, हैजा, प्लेगादिमारक, आकाश में देव मूर्त्तियां इत्यादि—जब-जब जिस २ देश, नगर ग्राम आदिकों दैवी उपद्रव (अलौकिक) हावें, तब २ इस अद्भुत कर्म के प्रकरण पृ० २२३ से २५१ तक को भली भांति पढ़ समझकर शान्ति की पद्धति द्वारा उस उस कर्म की शान्ति करावे अवश्य कल्याण होगा। ९३ कण्डिका से १३६ कण्डिका तक में क्रमशः सूत्रों की संख्या । ४३, १८, ५, ५, ५, ९, ४, ५, ४ ४, ५, ५, ४, २४, ९, ४, ४, १०, ८, ११, ३, ४, ४, ३, ८, ५, २, ५, २४, २, ३, २, ७, ४, १४, १२, ६, ४, ३, २, ८, २, १२, ४४, अध्याय १४ १३७-४३ यज्ञ गृहरचना आदि । सर्व पाक यज्ञिय कर्म । २५१-२५५ १३८-१६ अष्टका कर्म का वर्णन । २५५-२५६ १३९-२८ अभिजित नक्षत्र में जब चन्द्रका का सम्बन्ध होवे, उस- २५६-२५८ समय अध्यापक अपने शिष्यों के साथ उत्सव करे । १४०-२२ महाराताओं, राजाओं को करने योग्य इन्द्रमहोत्सव २५९-२६० १४१-४५ वेदों के पढ़ने पढ़ाने तथा जिस २ समय पढ़ना, पढ़ाना- २६०-२६३ बन्द होगा इसका विचार । संक्षिप्तटोका संग्रह (ग्रंथ की समाप्ति में) १-५६ शुद्धिपत्र १-३