भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

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( २ ) समय की चिन्ता, धर्म, विश्वास, सभ्यता, उपासना, पद्धति देवोत्थान, सामाजिक, रीति, नीति, आशा, भरोसा और हृदय का भाव काल के अनन्त स्रोत के गर्भ में विलीन हुए हैं, जिस समय के इतिहास के उद्धार के लिये अन्य उपाय विद्यमान नहीं उसी स्मरणातीत समय का इतिहास सुप्रणाली बद्धरूप वेदों में ही सोने के अक्षरों में लिपिबद्ध हैं। इसी निमित्त सभ्य जगत् के सर्वत्र पण्डित मण्डली में वेदों की संहिताओं का इतना सम्मान और आदर है। वेदों की संहितायें चार हैं—ऋग्वेद , यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद जिनमें से—यहां अथर्ववेद के सम्बन्ध में लिखा जाता है।

अथर्ववेद की उत्पत्ति ।

दैवीं वाचमजनयन्त देवास्तां, विश्वरूपा पशवो वदन्ति । मन्द्रेष मूंर्जं दुहाना, धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतै तु ॥ १ ॥ भा० टी०—दैवी वाणी को देवताओं ने उत्पन्न किया, उसी को अनेक प्रकार के पशु बोलते हैं, गम्भीरनादमय धेनुस्वरूप वह वाणी हमारे द्वारा अभिष्टुत होकर अन्न तथा बल को देती हुई हमको प्राप्त हो ॥१॥ ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव, विश्वस्य कर्त्ता भुवनस्य गोप्ता ॥ स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठा मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥ १ ॥ अथर्वणे यां प्रवदेत ब्रह्मा अथर्वातां पुरोवाचाङ्गिरे ब्रह्मविद्याम् । स भरद्वाजाय सत्यवाहाय प्राह भरद्वाजोऽङ्गिरसे परावराम् ॥ २ ॥ भा०टी०—विश्वरचयिता और उसका पालयिता देवताओं में पहिले ब्रह्मा हुए। वह सारी विद्याओं में प्रतिष्ठित वेदविद्या को अपने सबसे बड़े पुत्र अथर्व ऋषि को कहने लगे ॥ १ ॥ ब्रह्मा ने जिस वेद विद्या को अथर्वा से कहा, अथर्वा ने उसी को पहिले अङ्गिरा के प्रति कहा, अङ्गिरा ने भरद्वाज से कहा, और भरद्वाजने उसी परावरविद्याको आङ्गिरस से कहा ॥२॥ अथर्ववेद की मुण्डकोपनिषद् की इन दो श्रुतियों से वेदमात्र का पहिला वक्ता ब्रह्मा ही सिद्ध होते हैं। अथर्ववेद में प्राकृतिक पदार्थों के गुण वर्णन द्वारा, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के रोगों की दवा का उपदेश है। जैसे—पृथिवी (मिट्टी) इसमें सर्प के विष को चूसने का गुण है (सर्प के काटे को भूमि में गढ़ा खोद कर श्वास लेने, जितना भाग छोड़ कर गाड़ देने से--सर्प विष