भारतकोश
कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

कौशिक गृह्यसूत्रम् (अथर्ववेद शौनक शाखा - संक्षिप्त टीका एवं पं. उदयनारायण सिंह हिन्दी अनुवाद)

Kausika Grihyasutram of Atharvaveda with Hindi Translation

महर्षि कौशिक (अनुवादक: पण्डित उदयनारायण सिंह) द्वारा

DevanagariHindipublished361 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 361 में से

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( ३ ) दूर हो जाता है ) । पृथिवी सम्भत् ( ऊषर पड़त मिट्टी ) अर्थात् रेह मिट्टी में कफ वाली खांसी को हटाने का गुण है। देवी मिट्टी में ( सौराष्ट्र मृत्तिका ) केशोंको काले, लम्बे और दृढ़ बनाने का गुण है और खान- पान आदि में दिये स्थावर बिष को नष्ट करती है। उपजीकोद्भृत् ( दीमक की मिट्टी ) व्रण ( घाव के गिरते पीव ) स्राव को और नशा करने वाले स्थावर विष से हुई मूर्च्छा और सर्प विष को भी नष्ट करती है। ऊँचे टीले और पहाड़ों पर दौड़ कर चढ़ जाने से तुरन्त काटे सर्प का विष निर्बल हो जाता है। अब जल का गुण कहते हैं। आपः ( जल ) जल में तुरन्त के घाव, स्वप्नदोष, नीद का न होना, और क्षेत्रिय ( वंश परम्परागत रोग ) को दूर करने का गुण है। और जल नेत्र-दृष्टि-वर्द्धक है। नदी के प्रवाहित जल में तैरने से सर्प विप दूर होता है। अवत्क ( ऊँचे से नीचे गिरता हुआ जल ) हिमालय पर्वत से निकलते हुए झरने का जल, हृदय जलन, और नेत्र जलन को दूर करता है। नये कूप का जल और ऊँचे से नीचे गिरता हुआ ( फाल का ) जल व्रणस्राव नाशक है। मेघवृष्टि धारा रुके मूत्र को निकाल देती है। और जल सब ही रोगों का नाशक है। अग्नि—शीत रोग को दूर करता है, सर्प विप को जला कर नष्ट कर देता है। कृमि दूषित आहार को शुद्ध करता है। रुके मूत्र को निकालता है और सुख से प्रसव कराता है। और सब रोगों का नाशक और रसायन है। भूरिधायस पर्जन्य ( पार्थिव अग्नि ) और होमाग्नि ( होम का अग्नि ) इन अग्नियों के गुण ऊपर कहे गये जानो। विद्युत या बिजुली इन्द्र ( विद्युत् शक्ति वाला ) इसके द्वारा सारे रोग दूर होते हैं। वरुण ( विद्युत् धारा ) भोजन में से कृमि दोष को दूर करता है। रुके मूत्र को बाहर निकालता है और रसायन है। वायु—मरुत् ( साधारण चलता हुआ वायु ) वायु स्वास्थ्यप्रद है, शरीर में दवा का काम करता है। सुख से प्रसव कराता है। सब रोग नाशक है। रुके मूत्र को बाहर निकालता है और रसायन है। वेधा ( प्रत्येक ऋतु का वायु ) बृहस्पति ( ऊपर का वायु ) मित्र ( साधन या यंत्र से प्रेरित वायु ) इन सबों में ऊपर कहे गुण हैं। मेघ, वृषा ( बादल ) गर्जना कर बरसता हुआ सर्प विष नाशक है। चन्द्र ( चन्द्रमा ) चन्द्रमा की चान्दनी रुके मूत्र को बाहर निकालती है और क्षेत्रिय रोगों को दूर करती है। सूर्य—हृदय रोग, हलीमक, कामला, अपची, गण्डमाला, शिरोरोग को नष्ट करता

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