भारतकोश
कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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पृष्ठ 490
४०६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ पाँचवां अधिकरण

(१) तेन पारशवः परिचारिकापुत्रश्च व्याख्यातौ । (२) दूष्यं महामात्रं वा सत्रिप्रोत्साहितो भ्राता दायं याचेत । तं दूष्य-गृहप्रतिद्वारि रात्रावुपशयानमन्यत्र वा वसन्तं तीक्ष्णो हत्वा ब्रूयात्—हतोऽयं दायकामुकः इति । ततो हतपक्षं परिगृह्येतरं निगृह्णीयात् । (३) दूष्यसमीपस्थां वा सत्रिणो भ्रातरं दायं याचमानं घातेन परि-भर्त्सयेयुः । तं रात्राविति समानम् । (४) दूष्यमहामात्रयोर्वा यः पुत्रः पितुः पिता वा पुत्रस्य दारानधि-चरति भ्राता वा भ्रातुस्तयोः कापटिकमुखः कलहः पूर्वेण व्याख्यातः । (५) दूष्यमहामात्रपुत्रमात्मसम्भावितं वा सत्त्री—‘राजपुत्रस्त्वं शत्रु-भयादिह न्यस्तोऽसि ।’ इत्युपचरेत् । प्रतिपन्नं राजा रहसि पूजयेत्—‘प्राप्त-


बीच झगड़ा करवा दे । जब वह शस्त्र या विष आदि से अपने भाई की हत्या कर डाले तो इस पर भ्रातृ-घात का अपराध लगा कर राजा उसको भी मरवा दे ।

( १ ) यही व्यवहार पारशव ( महामात्र द्वारा नीच वर्ण की स्त्री से पैदा हुआ पुत्र ) और परिचारिका पुत्र ( दासी पुत्र ) के साथ किया जाय ।

( २ ) या तो सत्री द्वारा उभड़ा हुआ भाई दूषणीय महामात्र से अपने दायभाग की मांग करे फिर तीक्ष्ण नामक गुप्तचर दूषणीय के घर के दरवाजे के बाहर सोते या अन्यत्र निवास करते हुए रात में उसको मार कर जनता में यह प्रचार करे कि ‘यह अपना दायभाग माँगता था इसलिए इसके महामात्र भाई ने इसको मरवा डाला’ । इसके बाद राजा उस मृतक के बन्धु-बांधव, लड़के, मामा आदि को बुलवा कर उनको उकसायें कि यह महामात्र ही भाई का घातक है । ऐसी युक्ति से राजा उसको मरवा डाले ।

( ३ ) अथवा राजद्रोही महामात्र के आसपास रहने वाले लोग दायभाग माँगने वाले उसके भाई को ‘हम तुझे मार डालेंगे’ कहकर धमकायें । फिर पूर्वोक्त रीति से तीक्ष्ण द्वारा उसको मरवा कर यह प्रचारित करवा कर उसको भी मरवा दे कि ‘यह महामात्र भाई का हत्यारा है ।’

( ४ ) यदि दूष्य और महामात्र का पुत्र अपने पिता की स्त्रियों के साथ; पिता, पुत्रों की स्त्रियों के साथ और भाई, भाई की स्त्री के साथ व्यभिचार करे तो कापटिक गुप्तचर द्वारा उनका आपस में झगड़ा करा दिया जाय और तदनन्तर पूर्वोक्त विधि से उनका काम-तमाम करा दिया जाय ।

( ५ ) अपने आप को बहादुर तथा उदार समझने वाले महामात्र के पुत्र के पास जाकर सत्री कहें कि ‘तुम तो युवराज हो सकते हो; व्यर्थ ही शत्रु के भय से यहाँ पड़े हो’ । सत्री के वचनों पर विश्वास करके जब वह राजा के पास आवे तो

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