कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्र० १२४-१२६ : अ० १८] मध्यमोदासीनमण्डल-चरित ५४९
(१) अर्थयुक्त्या चलं मित्रं सन्धि यदुपगच्छति ।
तस्यापगमने हेतुं विहन्यान्न चलेद्यथा ॥(२) अरिसाधारणं यद्वा तिष्ठेत्तदरितः शठम् ।
भेदयेद् भिन्नमुच्छिन्द्यात्ततः शत्रुमनन्तरम् ॥(३) उदासीनं च यत्तिष्ठेत्सामन्तैस्तद्विरोधयेत् ।
ततो विग्रहसन्तप्तमुपकारे निवेशयेत् ॥(४) अमित्रं विजिगीषुं च यत्सञ्चरति दुर्बलम् ।
तद्बलेनानुगृह्णीयाद्यथा स्यान्न पराङ्मुखम् ॥
अपनीय ततोऽन्यस्यां भूमौ वा सन्निवेशयेत् ।
निवेश्य पूर्वं तत्रान्यं दण्डानुग्रहहेतुना ॥(५) अपकुर्यात्समर्थं वा नोपकुर्याच्चदापदि ।
उच्छिन्द्यादेव तन्मित्रं विश्वस्याङ्कमुपस्थितम् ॥
( १ ) जो चंचल प्रकृति का मित्र लोभवश सन्धि करे, उससे सन्धि बनाये रखने के लिए विजिगीषु को चाहिए कि, सन्धि नष्ट कर देने वाली उसकी अर्थलिप्सा को, स्वयं ही कुछ धन देकर पूरी कर दे, जिससे वह सन्धि न तोड़ सके ।
( २ ) जो धूर्त मित्र विजिगीषु के शत्रु के साथ मिलकर रहता हो, पहिले तो उसके और शत्रु के बीच फूट डालनी चाहिए और फिर उसका उन्मूलन करके शत्रु का भी उन्मूलन कर देना चाहिए ।
( ३ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह उदासीन मित्रों का विरोध सामन्त से करा दे । जब वह लड़ाई में फँस जाय और लड़ाई से बहुत तंग आ जाय तब उसका उपकार कर दे ।
( ४ ) जो दुर्बल मित्र अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए शत्रु और विजिगीषु, दोनों का आश्रय लेना चाहे, विजिगीषु को चाहिए कि ऐसे दुर्बल मित्र को वह सेना आदि की सहायता देकर उपकृत करता रहे, जिससे वह शत्रु पक्ष में न जा मिले । अथवा उसको उसकी भूमि से उठाकर दूसरी भूमि में बसा दे; अथवा जहाँ शत्रु की सहायता का कोई अंदेशा न हो ऐसी अपनी ही भूमि में बसा दे; और उसकी भूमि में, उसके जाने से पूर्व, सेना द्वारा सहायता पहुँचाने के लिए किसी समर्थ व्यक्ति को नियुक्त कर दे ।
( ५ ) जो मित्र विजिगीषु का अपकार करे, या विजिगीषु के ऊपर कोई विपत्ति आने पर समर्थ होकर भी सहायता न करे; विजिगीषु को चाहिए कि ऐसे मित्र को पहिले खूब विश्वास दिलाये और बाद में उसका उच्छेद कर दे ।