कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण
(१) मित्रव्यसनतो वाऽरिरुत्तिष्ठेद्योऽनवग्रहः ।
मित्रेणैव भवेत्साध्यश्छादितव्यसनेन सः ॥
(२) अमित्रव्यसनान्मित्रमुत्थितं यद्विरज्यति ।
अरिव्यसनसिद्ध्या तच्छत्रुणैव प्रसिद्ध्यति ॥
(३) वृद्धिं क्षयं च स्थानं च कर्शनोच्छेदनं तथा ।
सर्वोपायान्समादध्यादेतान् यश्चार्थशास्त्रवित् ॥
(४) एवमन्योन्यसंचारं षाड्गुण्यं योऽनुपश्यति ।
स बुद्धिनिगलैर्बद्धैरिष्टं क्रीडति पार्थिवैः ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे मध्यमचरितोदासीनचरितमण्डलचरितानि नाम अष्टादशोऽध्यायः, आदितः पञ्चदशोत्तरशततमः ॥
समाप्तमिदं षाड्गुण्यं नाम सप्तममधिकरणम् ।
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(१) यदि विजिगीषु का शत्रु विजिगीषु के मित्र को आपद्ग्रस्त जानकर बिना किसी अवरोध-आक्रमण के उन्नति कर जाय तो अपने मित्र की आपत्ति दूर हो जाने पर उस मित्र के द्वारा ही विजिगीषु शत्रु को वश में करने का यत्न करे ।
(२) जो मित्र अपने शत्रु पर आपत्ति आ जाने से उन्नत होकर विजिगीषु के अनुकूल नहीं रहता, उसे उसके शत्रु की आपत्ति दूर हो जाने पर, उसी के द्वारा वश में किया जाय ।
(३) अर्थशास्त्रज्ञ राजा को उचित है कि वह वृद्धि, क्षय, स्थान, कर्शन, और उच्छेदन तथा साम, दाम आदि सभी उपायों का प्रयोग खूब सोच-विचार कर करे ।
(४) जो राजा इन छह गुणों का विचारपूर्वक प्रयोग करता है, वह निश्चित ही अपनी बुद्धिरूपी श्रृंखला से बाँधे हुए अन्य राजाओं के साथ इच्छानुसार क्रीड़ा कर सकता है ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में मध्यमोदासीनमण्डलचरित नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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