कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र |
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अर्थानर्थसंशययुक्ताः ॥ ११ ॥ तासामुपायविकल्पजाः सिद्धयः ॥ १२ ॥
इत्यभियास्यत्कर्म नवममधिकरणम् ।
(१) स्कन्धावारनिवेशः ॥१॥ स्कन्धावारप्रयाणम् ॥२॥ बलव्यसना-
वस्कन्दकालरक्षणम् ॥ ३ ॥ कूटयुद्धविकल्पाः ॥ ४ ॥ स्वसैन्योत्साहनम्
॥ ५ ॥ स्वबलान्यबलव्यायोगः ॥ ६ ॥ युद्धभूमयः ॥ ७ ॥ पत्त्यश्वरथहस्ति-
कर्माणि ॥ ८ ॥ पक्षकक्षोरस्यानां बलाग्रतो व्यूहविभागः ॥ ९ ॥ सारफल्गु-
बलविभागः ॥ १० ॥ पत्त्यश्वरथहस्तियुद्धानि ॥ ११ ॥ दण्डभोगमण्डला-
संहतव्यूहव्यूहनम् ॥ १२ ॥ तस्य प्रतिव्यूहसंस्थापनम् ॥ १३ ॥
इति साङ्ग्रामिकं दशममधिकरणम् ।
(२) भेदोपादानानि ॥ १ ॥ उपांशुदण्डः ॥ २ ॥
इति सङ्घवृत्तमेकादशमधिकरणम् ।
(३) दूतकर्म ॥ १ ॥ मन्त्रयुद्धम् ॥ २ ॥ सेनामुख्यवधः ॥ ३ ॥ मण्डल-
प्रोत्साहनम् ॥ ४ ॥ शस्त्राग्निरसप्रणिधयः ॥ ५ ॥ विवधासारप्रसारवधः
॥ ६ ॥ योगातिसंधानम् ॥ ७ ॥ दण्डातिसंधानम् ॥ ८ ॥ एकविजयः ॥ ९ ॥
इत्याबलीयसं द्वादशमधिकरणम् ।
और शत्रुजन्य आपत्तियाँ; ११. अर्थ, अनर्थ तथा संशयसंबंधी आपत्तियाँ; १२. उन आपत्तियों के प्रतीकारों के उपायों से प्राप्त होनेवाली सिद्धियाँ ।
दसवाँ अधिकरण : संग्राम का निरूपण
(१) १. छावनी का निर्माण; २. छावनी का प्रयाण; ३. आपत्ति एवं आक्रमण के समय सेना की रक्षा; ४. कूटयुद्ध के भेद; ५. अपनी सेना को प्रोत्साहन; ६. अपनी और पराई सेना का प्रयोग; ७. युद्ध के योग्य भूमि; ८. पदाति, अश्व, रथ तथा हाथी आदि सेनाओं के कार्य; ९. पक्ष, कक्ष तथा उरस्य आदि विशेष व्यूहों का सेना के परिमाण के अनुसार व्यूहविभाग; १०. सार तथा फल्गु बलों का विभाग; ११. चतुरंग सेना का युद्ध; १२. दंडव्यूह, भोगव्यूह, मंडलव्यूह, असंगतव्यूह और उनके प्रकृतिव्यूह तथा विकृतिव्यूह की रचना; १३. उक्त दंडादि व्यूहों के प्रतिव्यूहों की रचना ।
ग्यारहवाँ अधिकरण : संघवृत्त-निरूपण
(२) १. भेदकप्रयोग; २. उपांशुदंड ।
बारहवाँ अधिकरण : आबलीयस का निरूपण
(३) १. दूतकर्म; २. मंत्रयुद्ध; ३. सेनापतियों का वध; ४. राजमंडल की सहायता; ५. शस्त्र, अग्नि और रथों का गूढ़ प्रयोग; ६. विवध, आसार और प्रसार का नाश; ७. योगातिसंधान; ८. दंडातिसंधान; ९. एकविजय ।