कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
पृष्ठ 91, कुल 918 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणाधिकरण-विभाजन
(१) उपजापः ॥ १ ॥ योगवानम् ॥ २ ॥ अपसर्पप्रणिधिः ॥ ३ ॥ पर्युपासनकर्म ॥ ४ ॥ अवमर्दः ॥ ५ ॥ लब्धप्रशमनम् ॥ ६ ॥
इति दुर्गलम्भोपायस्त्रयोदशमधिकरणम् ।
(२) परघातप्रयोगः ॥ १ ॥ प्रलम्भनम् ॥ २ ॥ स्वबलोपघात-प्रतीकारः ॥ ३ ॥
इत्यौपनिषदं चतुर्दशमधिकरणम् ।
(३) तन्त्रयुक्तयः ॥ १ ॥
इति तन्त्रयुक्तिः पञ्चदशमधिकरणम् ।
(४) शास्त्रसमुद्देशः पञ्चदशाधिकरणानि सपञ्चाशदध्यायशतं साशीतिप्रकरणशतं षट् श्लोकसहस्राणीति ।
(५) सुखग्रहणविज्ञेयं तत्त्वार्थपदनिश्चितम् ।
कौटिल्येन कृतं शास्त्रं विमुक्तग्रन्थविस्तरम् ॥
इति प्रकरणाधिकरणसमुद्देशः ।
तेरहवाँ अधिकरण : दुर्गप्राप्ति का निरूपण
(१) १. उपजाप; २. योगवामन; ३. गुप्तचरों का शत्रुदेश में निवास; ४. शत्रु के दुर्ग को घेरना; ५. शत्रु के दुर्ग को तोड़ना; ६. जीते हुए दुर्ग में शांति कायम करना ।
चौदहवाँ अधिकरण : औपनिषदिक-निरूपण
(२) १. शत्रुवध के प्रयोग; २. प्रलंभन योग; ३. शत्रुद्वारा अपनी सेना पर किये गए घातक प्रयोगों का प्रतीकार ।
पन्द्रहवाँ अधिकरण : तंत्रयुक्ति का निरूपण
(३) तंत्रयुक्तियाँ ।
(४) इस प्रकार सम्पूर्ण कौटिलीय अर्थशास्त्र में पन्द्रह अधिकरण; एक सौ पचास अध्याय; एक सौ अस्सी प्रकरण और छह हजार श्लोक हैं ।
[ उक्त श्लोकसंख्या अक्षरों की गणना से दी गई है । बत्तीस अक्षरों का एक अनुष्टुप् छन्द होता है । यदि इस कौटिलीय अर्थशास्त्र के अक्षरों को अनुष्टुप् छन्द में बांध दिया जाय तो छह हजार श्लोक बनते हैं । ]
(५) इस अर्थशास्त्र में तत्त्वार्थ और पदों का प्रयोग किया गया है । व्यर्थ विस्तार से यह ग्रन्थ सर्वथा मुक्त है । सरलमति बालक भी इस ग्रन्थ को सुखपूर्वक समझ सकते हैं । इस अर्थशास्त्र को कौटिल्य ने बनाया है ।
प्रकरण एवं अधिकरण का निरूपण समाप्त ।