कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| प्रकरण २ | ## वृद्ध-संयोगः |
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| अध्याय ४ |
(१) तस्माद्दण्डमूलास्तिस्रो विद्याः । विनयमूलो दण्डः प्राणभृतां योगक्षेमावहः ।
(२) कृतकः स्वाभाविकश्च विनयः । क्रिया हि द्रव्यं विनयति नाद्रव्यम् । शुश्रूषाश्रवणग्रहणधारणविज्ञानोहापोहतत्त्वाभिनिविष्टबुद्धिं विद्या विनयति नेतरम् ।
(३) विद्यानां तु यथास्वमाचार्यप्रामाण्याद्विनयो नियमश्च ।
(४) वृत्तचौलकर्मा लिपिं संख्यानं चोपयुञ्जीत । वृत्तोपनयनस्त्रयीमान्वीक्षिकीं च शिष्टेभ्यः, वार्तामध्यक्षेभ्यः, दण्डनीतिं वक्तृप्रयोक्तृभ्यः ।
(५) ब्रह्मचर्यं चाषोडशाद्वर्षात् । अतो गोदानं दारकर्म च । अस्य नित्यश्च विद्यावृद्धसंयोगो विनयवृद्ध्यर्थं तन्मूलत्वाद्विनयस्य ।
वृद्धजनों की संगति
( १ ) यही कारण है कि आन्वीक्षकी, त्रयी और वार्ता, इन तीनों विद्याओं का अस्तित्व दण्डनीति पर आधारित है । शास्त्रविहित उचित रीति से प्रयुक्त दण्ड प्रजा के योगक्षेम का साधक होता है ।
( २ ) विनय ( शिक्षा ) दो प्रकार का होता है : १. कृतक ( कृत्रिम, बनावटी, नैमित्तिक ) और २. स्वाभाविक ( स्वतःसिद्ध ) । शिक्षा सुपात्र को ही योग्य बना सकती है, अपात्र को नहीं । विद्या से वही योग्य हो सकते हैं, जो कि शुश्रूषा, श्रवण, ग्रहण, धारण, विज्ञान, ऊहापोह ( तर्क-वितर्क ) में विवेक तथा बुद्धि से काम लेते हैं ।
( ३ ) विभिन्न विद्याओं के विभिन्न आचार्यों के मतानुसार ही शिष्य का शिक्षण और नियमन होना चाहिए ।
( ४ ) मुण्डन-संस्कार के बाद वर्णमाला और अङ्कमाला का अभ्यास करे । उपनयन के बाद सदाचारशील विद्वान् आचार्यों से त्रयी तथा आन्वीक्षकी, विभागीय अध्यक्षों से वार्ता और वक्ता-प्रयोक्ता विशेषज्ञों (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव आदि के आचार्यों) से दण्डनीति की शिक्षा ग्रहण करे ।
( ५ ) सोलह वर्ष पर्यन्त ब्रह्मचर्य का पालन करे । तदनन्तर समावर्तन संस्कार ( केशान्त कर्म ) और विवाह करे । विवाह के बाद अपने विनय ( शिक्षा ) की वृद्धि