केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ
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९२ केनोपनिषद् [ खण्ड ३
वाक्य-भाष्य परित्यक्तानि न फलं कालान्तरे | कर्ताद्वारा त्याग दिये जाते हैं, कालान्तर- कर्तुमुत्सहन्ते न हि हलं क्षेत्राद् | में उसका फल देनेमें समर्थ नहीं हो व्रीहीन्गृहं प्रवेशयति । भूतकर्म- | सकते । हल धान्योंको खेतसे ले जाकर णोश्चाचेतनत्वात्स्वतः प्रवृत्त्यनुप- | घरमें नहीं पहुँचा सकता । अतः | अचेतन होनेके कारण भूत और पत्तिः । वायुवदिति चेन्नासिद्ध- | कर्मोंकी स्वतः प्रवृत्ति असम्भव है । | यदि कहो कि [ अचेतन होनेपर भी ] त्वात् । न हि वायोरचितिमत्- | वायुके समान इनकी स्वतः प्रवृत्ति हो | सकती है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, स्वतःप्रवृत्तिः सिद्धा रथादिष्व- | क्योंकि वह असिद्ध है । अचेतन | वायुकी स्वतः प्रवृत्ति सिद्ध नहीं हो दर्शनात् । | सकती, क्योंकि रथादि अन्य अचेतन | पदार्थोंमें वह देखी नहीं जाती । शास्त्रात्कर्मण एवेति चेच्छास्त्रं | मीमांसक-शास्त्रानुसार तो कर्मसे हि क्रियातः फलसिद्धिमाह | ही फल मिलता है, क्योंकि 'स्वर्गकामो नेश्वरादेः स्वर्गकामो यजेतेत्यादि। | यजेत' इत्यादि शास्त्र कर्मसे ही फलकी न च प्रमाणाधिगतत्वादानर्थक्यं | सिद्धि बतलाता है, ईश्वरादिसे नहीं । | इस प्रकार जो बात प्रमाणसिद्ध है युक्तम् । न चेश्वरस्तित्वे प्रमा- | उसको व्यर्थ बतलाना भी ठीक नहीं है, णान्तरमस्तीति चेत् । | और ईश्वरकी सत्तामें भी [अर्थापत्तिका | छोड़कर] और कोई प्रमाण नहीं है । न । दृष्टन्यायहानानुपपत्तेः । | सिद्धान्ती-ऐसा कहना ठीक नहीं, | क्योंकि दृष्ट न्यायको त्यागना उचित [क्रियाभेद-] क्रिया हि द्विविधा दृष्ट- | नहीं है । क्रिया दो प्रकारकी है— [निरूपणम्] फलादृष्टफला च, दृष्ट- | दृष्टफला और अदृष्टफला । दृष्ट- फलापि द्विविधानन्तर- | फलाके भी दो भेद हैं—अनन्तरफला¹ फलागामिफला च, अनन्तरफला | और आगामिफला² । गमन और गतिभुजिलक्षणा । कालान्तरफला | भोजन इत्यादि क्रियाएँ अनन्तरफला | हैं तथा कृषि और सेवा आदि
१. तत्काल फल देनेवाली । २. भविष्यमें फल देनेवाली ।