भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १०३ पद-भाष्य इत्येतद्दर्शनार्थं वा आख्यायिका, मान है वह देवताओंके जय आदिके अभिमानके समान मिथ्या यथा देवानां जयाद्यभिमानः है—यह बात दिखानेके लिये ही तद्वदिति । प्रस्तुत आख्यायिका है। वाक्य-भाष्य एवमिह बौद्धादिवृत्त्युद्भववि- भी बुद्धि आदिकी वृत्तियोंके उदय भवाकुलभ्रान्त्याध्यारोपितः सुख- और अस्तसे वैचित्र्यको प्राप्त हुई भ्रान्तिसे आरोपित सुख-दुःखादिका दुःखादियोग उपपद्यते । योग हो सकता है। तत्स्मरणाच्च । तस्यैवेश्वरस्यैव इस विषयमें उसीकी स्मृति भी है हि स्मरणम्—"मत्तः स्मृतिर्ज्ञान- अर्थात् उस ईश्वरके ही स्मृतिवाक्य भी हैं; जैसे—"मुझहीसे प्राणियोंको मपोहनं च" (गीता १५ । १५) स्मृति, ज्ञान और अज्ञान प्राप्त "नादत्ते कस्यचित्पापम्" (गीता होते हैं" "ईश्वर किसीके पापको ५ । १५) इत्यादि । अतो नित्य- स्वीकार नहीं करता" इत्यादि । अतः मुक्त एकस्मिन्सवितरीव लोका- सूर्यके समान एक ही नित्यमुक्त ईश्वरमें विद्याध्यारोपितमीश्वरे संसारि- लोकने अविद्यावश संसारित्वका आरोप कर रखा है, तथा शास्त्रादि प्रमाणों- त्वम् । शास्त्रादिप्रामाण्यादभ्युप- से उसका असंसारित्व जाना गया है; गतमसंसारित्वमित्यविरोध इति। इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है। एतेन प्रत्येकं ज्ञानादिभेदः इससे प्रत्येक जीवके ज्ञानादि भेदका प्रत्युक्तः सौक्ष्म्यचैतन्यसर्वगतत्वा- प्रत्याख्यान हो गया, क्योंकि उन सभीमें सूक्ष्मता, चैतन्य और सर्वगतत्वादि धर्म द्यविशेषे च भेदहेत्वभावात् । समानरूपसे रहनेके कारण भेदके हेतुका अभाव है। यदि उन्हें विकारी माना जाय विक्रियावत्त्वे चानित्यत्वात् । तो वे अनित्य हो जायेंगे । इसके सिवा मुक्तावस्थामें किसीने भी आत्माका मोक्षे च विशेषानभ्युपगमादभ्युप- कोई विशेष भाव नहीं माना, यदि कोई मानेगा तो अनित्यत्वका प्रसंग गमे चानित्यत्वप्रसङ्गात्। अविद्या- उपस्थित हो जायगा। तथा भेद तो वदुपलभ्यत्वाच्च भेदस्य । केवल अविद्यावान्‌को ही उपलब्ध होता