भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 124

११६           केनोपनिषद्           [ खण्ड ३

पद-भाष्य तस्येन्द्रस्य यक्षे भक्तिं बुद्ध्वा | उस इन्द्रकी यक्षमें भक्ति विद्या उमारूपिणी प्रादुरभूत्स्त्री- | जानकर स्त्रीवेषधारिणी उमारूपा रूपा । स इन्द्रः ताम् उमां | विद्यादेवी प्रकट हुई । वह इन्द्र उस बहुशोभमानाम्—सर्वेषां हि | अत्यन्त शोभामयी हैमवती उमाके शोभमानानां शोभनतमा विद्या, | पास गया । समस्त शोभायमानोंमें तदा बहुशोभमानेति विशेषण- | विद्या ही सबसे अधिक शोभामयी मुपपन्नं भवति; हैमवतीं हेम- | है; इसलिये उसके लिये 'बहु कृताभरणवतीमिव बहुशोभ- | शोभमाना' यह विशेषण उचित ही मानामित्यर्थः; अथवा उमैव | है। हैमवती अर्थात् हेम ( सुवर्ण ) हिमवतो दुहिता हैमवती नित्य- | निर्मित आभूषणोंवालीके समान मेव सर्वज्ञेनेश्वरेण सह वर्तत | अत्यन्त शोभामयी । अथवा हिमवान्- इति ज्ञातुं समर्थेति कृत्वा ताम्— | की कन्या होनेसे उमा ( पार्वती ) उपजगाम इन्द्रस्तां ह उमां किल | ही हैमवती है। वह सर्वदा उस सर्वज्ञ उवाच पप्रच्छ—ब्रूहि किमेतद्दर्श- | ईश्वरके साथ वर्तमान रहती है; अतः यित्वा तिरोभूतं यक्षमिति ॥१२॥ | उसे जाननेमें समर्थ होगी—यह               | सोचकर इन्द्र उसके पास गया,               | और उससे पूछा—'बतलाइये, इस               | प्रकार दर्शन देकर छिप जानेवाला               | यह यक्ष कौन है?' ॥ १२ ॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥

वाक्य-भाष्य विद्यामाजगाम । अभिप्रायोद्बोध- | विद्यादेवीके पास आया । ब्रह्मके गुप्त हेतुत्वादुद्रपत्न्युमा हैमवतीव सा | हो जानेके अभिप्रायको प्रकट करनेके शोभमाना विद्यैव । विरूपोऽपि | कारण रुद्रपत्नी हिमालयपुत्री पार्वती- विद्यावान्बहु शोभते ॥ १२ ॥ | के समान शोभामयी यह ब्रह्मविद्या ही               | थी, क्योंकि विद्यावान् पुरुष रूपहीन               | होनेपर भी बहुत शोभा पाता है॥१२॥ इति तृतीयः खण्डः ॥ ३ ॥