भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 152 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 134

१२६ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ किंच | तथा— वन-संज्ञक ब्रह्मकी उपासनाका फल तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाभि हैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥ ६ ॥ वह यह ब्रह्म ही वन ( सम्भजनीय ) है । उसकी 'वन'—इस नामसे उपासना करनी चाहिये । जो उसे इस प्रकार जानता है उसे सभी भूत अच्छी तरह चाहने लगते हैं ॥ ६ ॥ पद-भाष्य तद् ब्रह्म ह किल तद्वनं नाम | वह ब्रह्म निश्चय ही 'तद्वन' तस्य वनं तद्वनं तस्य प्राणिजातस्य | नामवाला है । 'तस्य वनं तद्वनम्' | [ इस प्रकार यहाँ षष्ठी तत्पुरुष प्रत्यगात्मभूतत्वाद्वनं वननीयं | समास है ] । अर्थात् यह उस | प्राणिसमूहका प्रत्यगात्मस्वरूप होनेके संभजनीयम् । अतः तद्वनं नाम; | कारण वन—वननीय अर्थात् | भजनीय है । इसलिये इसका नाम प्रख्यातं ब्रह्म तद्वनमिति यतः, | 'तद्वन' है । क्योंकि ब्रह्म 'तद्वन' तस्मात् तद्वनमिति अनेनैव गुणा- | इस नामसे प्रसिद्ध है, इसलिये | उसकी 'तद्वन' इस गुणव्यञ्जक भिधानेन उपासितव्यं चिन्त- | नामसे ही उपासना—चिन्तन नीयम् । | करना चाहिये । वाक्य-भाष्य तस्य चाध्यात्ममुपासने गुणो | उस ब्रह्मकी अध्यात्म-उपासनामें विधीयते— | गुणका विधान किया जाता है— तद् तद्वनम् तदेतद्ब्रह्म तच्च | 'यह ब्रह्म तद् वन' है, यानी यह ब्रह्म | तत् अर्थात् परोक्ष और वन—अच्छी तद्वनं च तत्परोक्षं वनं | तरह भजन करने योग्य है । [ वन | धातुका अर्थ अच्छी प्रकार भजन सम्भजनीयम् । वनतेस्तत्कर्म- | करना है ] तत् शब्द जिसका कर्मभूत