केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 144, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें१३६ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य अङ्गिनि हि गृहीतेऽङ्गानि गृहीतानि क्योंकि अङ्गीके अधीन ही अङ्ग होते एव भवन्ति, तदायत्तत्वादङ्गा- हैं इसलिये अङ्गीके गृहीत होनेपर नाम् । उसके अङ्ग भी गृहीत हो ही जाते हैं । सत्यम् आयतनं यत्र तिष्ठत्यु- सत्य आयतन है । जहाँ वह पनिषत् तदायतनम् । सत्यमिति उपनिषद् स्थित होती है वही अमायिता अकौटिल्यं वाङ्मनः- उसका आयतन है । वाणी, मन कायानाम् । तेषु ह्याश्रयति और शरीरकी अमायिकता यानी विद्या ये अमायाविनः साधवः, अकुटिलताका नाम 'सत्य' है । नासुरप्रकृतिषु मायाविषु; "न जो लोग अमायावी और साधु येषु जिह्ममनृतं न माया च" ( शुद्धस्वभाव ) होते हैं उन्हींमें ( प्र० उ० १ । १६ ) इति ब्रह्मविद्या आश्रय लेती है, आसुरी श्रुतेः । तस्मात्सत्यमायतनमिति प्रकृतिवाले मायावियोंमें नहीं, जैसा कल्प्यते । तपआदिषु एव कि "जिनमें कुटिलता, मिथ्या और प्रतिष्ठात्वेन प्राप्तस्य सत्यस्य माया नहीं है" इत्यादि श्रुतिसे सिद्ध पुनरायतनत्वेन ग्रहणं साधना- होता है । अतः सत्य उसका तिशयत्वज्ञापनार्थम् । "अश्वमेध- आयतन है—ऐसी कल्पना की सहस्रं च सत्यं च तुलया धृतम् । जाती है । तप आदिमें ही प्रतिष्ठा- अश्वमेधसहस्राच्च सत्यमेकं विशि- रूपसे प्राप्त हुए सत्यको फिर ष्यते" ( विष्णुस्मृ० ८ ) इति आयतनरूपसे ग्रहण करना उसका स्मृतेः ॥ ८ ॥ अतिशय साधनत्व प्रदर्शित करनेके लिये है । "सहस्र अश्वमेध और सत्य तराजूमें रखे जानेपर सहस्र अश्वमेधोंकी अपेक्षा अकेला सत्य ही विशेष ठहरता है" इस स्मृतिसे भी यही प्रमाणित होता है ॥ ८ ॥ -------------------❖-------------------