भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

१२ केनोपनिषद् [ खण्ड १ पद-भाष्य कर्मसहभावित्वाविरोधाच्च प्रत्य- | इसके सिवा आत्मा और ब्रह्मके ज्ञानकर्मविरोध- गात्मब्रह्मविज्ञानस्य । | एकत्वज्ञानका कर्मके साथ-साथ प्रदर्शनम् | होनेमें विरोध भी है । जिसमें न ह्युपात्तकारकफल- | [ कर्ता-कर्मादि ] कारक और भेदविज्ञानेन कर्मणा प्रत्यस्त- | [ स्वर्गादि ] फलका भेद स्वीकार मितसर्वभेददर्शनस्य प्रत्यगात्म- | किया गया है उस कर्मके साथ ब्रह्मविषयस्य सहभावित्वम् | सम्पूर्ण भेददृष्टिसे रहित ब्रह्म और उपपद्यते, वस्तुप्राधान्ये सति | आत्माकी एकताके ज्ञानका रहना अपुरुषतन्त्रत्वाद्ब्रह्मविज्ञानस्य । | संगत नहीं है, क्योंकि ब्रह्मज्ञान तस्माद्दृष्टादृष्टेभ्यो बाह्यसाधन- | तो वस्तुप्रधान होनेके कारण पुरुष साध्येभ्यो विरक्तस्य प्रत्यगात्म- | ( कर्ता ) के अधीन नहीं है । विषया ब्रह्मजिज्ञासेयम् 'केनेषि- | अतः इस 'केनेषितम्' इत्यादि तम्' इत्यादिश्रुत्या प्रदर्श्यते । | श्रुतिके द्वारा यह दृष्ट और अदृष्ट शिष्याचार्यप्रश्नप्रतिवचनरूपेण | बाह्यसाधन एवं साध्योंसे विरक्त कथनं तु सूक्ष्मवस्तुविषयत्वात् | हुए पुरुषकी ही प्रत्यगात्मविषयक सुखप्रतिपत्तिकारणं भवति । | ब्रह्मजिज्ञासा दिखलायी जाती है । केवलतर्कागम्यत्वं च दर्शितं | शिष्य और आचार्यके प्रश्नोत्तररूपसे भवति । | यह कथन वस्तुका सुगमतासे ज्ञान | करानेमें कारण है क्योंकि यह | विषय सूक्ष्म है । इसके सिवा | केवल तर्कद्वारा इसकी अगम्यता | भी दिखलायी गयी है । वाक्य-भाष्य नित्या । नित्यत्वं चेष्टं मोक्षस्य । | सकती; और मोक्षकी नित्यता ही इष्ट अत उत्पन्नविद्यस्य कर्मारम्भो- | है। इसलिये जिसे आत्मज्ञान हो गया है ऽनुपपन्नः, अतो व्यावृत्तबाह्यबुद्धेः | उसके लिये कर्मका आरम्भ नहीं बन आत्मविज्ञानाय केनेषितमित्या- | सकता। अतः जिसकी बाह्य-बुद्धि निवृत्त द्यारम्भः । | हो गयी है उसे आत्मतत्त्वका ज्ञान | करानेके लिये 'केनेषितम्' इत्यादि | उपनिषद् आरम्भ की जाती है । १. अर्थात् आत्मापर परमानन्दत्व आदि गुणोंका आधान या उसका ब्रह्माण्ड- बाह्य ब्रह्मको प्राप्त होना नित्य नहीं हो सकता ।