केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 23, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५ पद-भाष्य गच्छति स्वविषयं प्रतीति सम्बध्यते | है—यहाँ 'पतति' क्रियाके साथ | 'स्वविषयं प्रति' का सम्बन्ध इषेराभीक्ष्ण्यार्थस्य गत्यर्थस्य चेहा- | (अन्वय) है । यहाँ आभीक्ष्ण्य | और गत्यर्थक * 'इष्' धातु सम्भव सम्भवादिच्छार्थस्यैवैतद्रूपमिति | न होनेके कारण यह इच्छार्थक | 'इष्' धातुका ही [ इषितम् ] रूप गम्यते । इषितमिति इट्प्रयोग- | है—ऐसा जाना जाता है। [ 'इष्टम्' | के स्थानमें 'इषितम्' ] यह इट्-प्रयोग स्तुच्छान्दसः । तस्यैव प्रपूर्वस्य | छान्दस (वैदिक)† है। उस प्र-पूर्वक | 'इष् धातुका ही प्रेरणा अर्थमें नियोगार्थे प्रेषितमित्येतत् । | 'प्रेषितम्' रूप हुआ है । यदि तत्र प्रेषितमित्येवोक्ते प्रेषयितृ- | यहाँ केवल 'प्रेषितम्' इतना ही | कहा होता तो प्रेषण करनेवाले प्रेषणविशेषविषयाकाङ्क्षा स्यात्— | और उसके प्रेषण-प्रकारके | सम्बन्धमें ऐसी शङ्का हो सकती थी केन प्रेषयितृविशेषेण, कीदृशं | कि किस प्रेषकविशेषके द्वारा और वा प्रेषणमिति । इषितमिति तु | किस प्रकार प्रेषण किया हुआ ? | अतः यहाँ 'इषितम्' इस विशेषणके विशेषणे सति तदुभयं निवर्तते, | रहनेसे ये दोनों शङ्काएँ निवृत्त हो | जाती हैं, क्योंकि 'इससे किसीकी कस्येच्छामात्रेण प्रेषितमित्यर्थ- | इच्छामात्रसे प्रेषित हुआ' यह विशेष | अर्थ हो जाता है । विशेषनिर्धारणात् । | वाक्य-भाष्य प्रेषितशब्दयोरर्थाविह सम्भवतः। | 'इषित' और 'प्रेषित' शब्दोंके मुख्य | अर्थ यहाँके लिये सम्भव नहीं हैं, न हि शिष्यानिव मन आदीनि | क्योंकि आत्मा मन आदिको विषयोंकी
- इष् धातुके अर्थ आभांक्ष्ण्य ( बारम्बार होना ) गति और इच्छा हैं । † व्याकरणका यह सिद्धान्त है कि 'छन्दसि दृष्टानुविधिः' वेदमें जो प्रयोग जैसे देखे गये हैं वहाँके लिये उनका वैसा ही विधान माना गया है ।