केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 25, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ १७ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ ❦ पद-भाष्य अतोऽन्यत्कूटस्थं नित्यं वस्तु | और इनसे पृथक् कूटस्थ नित्य बुभुत्समानः पृच्छतीति साम- | वस्तुको जाननेकी इच्छा करनेवाला र्थ्यादुपपद्यते । इतरथा इच्छावा- | है वही यह बात पूछ रहा है । क्कर्मभिर्देहादिसंघातस्य प्रेरयितृत्वं | अन्यथा इच्छा, वाक् और कर्मके द्वारा तो इस देहादि सङ्घातका प्रेरकत्व प्रसिद्ध ही है [ अर्थात् इच्छा, वाणी और कर्मके द्वारा यह प्रसिद्धमिति प्रश्नोऽनर्थक एव देहादि सङ्घात मनको प्रेरित किया करता है—इस बातको तो सभी जानते हैं ] । अतः यह प्रश्न स्यात् । | निरर्थक ही हो जाता । एवमपि प्रेषितशब्दस्यार्थो न | शङ्का—किन्तु इस प्रकार भी प्रदर्शित एव । | ‘प्रेषित’ शब्दका अर्थ तो प्रदर्शित हुआ ही नहीं । न; संशयवतोऽयं प्रश्न इति | समाधान—नहीं, यह प्रश्न किसी संशयालुका है इसीसे प्रेषितशब्दस्यार्थविशेष उपपद्यते । | ‘प्रेषित’ शब्दका अर्थविशेष उपपन्न हो सकता है [अर्थात् किं यथाप्रसिद्धमेव कार्यकारण- | जिसे ऐसा सन्देह है कि ] यह संघातस्य प्रेषयितृत्वम्, किं वा | प्रेरक-भाव सर्वप्रसिद्ध भूत और इन्द्रियोंके संघातरूप देहमें है, संघातव्यतिरिक्तस्य स्वतन्त्रस्य | अथवा उस सङ्घातसे भिन्न किसी स्वतन्त्र वस्तुमें ही केवल इच्छामात्रसे इच्छामात्रेणैव मनआदिप्रेषयितृ- | मन आदिकी प्रेरकता है ? इस वाक्य-भाष्य प्राण इति नासिकाभवः, | यहाँ प्रकरणवश ‘प्राण’ शब्दसे नासिकामें रहनेवाला वायु समझना प्रकरणातू । प्रथमत्वं प्रचलन- | चाहिये । चलन-क्रिया प्राण-निमित्तक क्रियायाः प्राणनिमित्तत्वात्स्वतो | होनेसे प्राणको प्रधान माना गया है ।