केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंखण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३१
आत्माका अज्ञेयत्व और अनिर्वचनीयत्व न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यादन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे ॥३॥ वहाँ (उस ब्रह्मतक) नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती, वाणी नहीं जाती, मन नहीं जाता। अतः जिस प्रकार शिष्यको इस ब्रह्मका उपदेश करना चाहिये, वह हम नहीं जानते—वह हमारी समझमें नहीं आता। वह विदितसे अन्य ही है तथा अविदितसे भी परे है—ऐसा हमने पूर्व- पुरुषोंसे सुना है, जिन्होंने हमारे प्रति उसका व्याख्यान किया था ॥ ३ ॥ पद-भाष्य न तत्र तस्मिन्ब्रह्मणि चक्षुः | वहाँ—उस ब्रह्ममें नेत्रेन्द्रिय गच्छति, स्वात्मनि गमना- | नहीं जाती, क्योंकि अपनेहीमें अपनी सम्भवात्। तथा न वाग् गच्छति। | गति होनी असम्भव है। और न वाणी वाचा हि शब्द उच्चार्यमाणोऽभि- | ही पहुँचती है। जिस समय वाणी- धेयं प्रकाशयति यदा, तदाभि- | से उच्चारण किया हुआ शब्द अपने धेयं प्रति वाग्गच्छतीत्युच्यते। | वाच्यको प्रकाशित करता है उस | समय ही, अपने वाच्यतक वाणी | पहुँचती है—ऐसा कहा जाता है। वाक्य-भाष्य न तत्र चक्षुर्गच्छति इत्युक्तेऽपि | यद्यपि आचार्यने तत्त्वका निरूपण पर्यनुयोगे हेतुप्रतिपत्तेः। | कर दिया तो भी न समझनेके कारण श्रोत्रस्य श्रोत्रमित्येवमादिना | शिष्यके पुनः प्रश्न करनेमें 'वहाँ उक्तेऽप्यात्मतत्त्वेऽप्रतिपन्नतवात् | नेत्रेन्द्रिय नहीं जाती' इत्यादि कारण सूक्ष्मत्वहेतोर्वस्तुनः पुनः | है। अर्थात् 'श्रोत्रस्य श्रोत्रम्' इत्यादि पुनः पर्यनुयुयुक्षाकारणमाह—न | श्रुतिसे आत्मतत्त्वका निरूपण कर | दिये जानेपर भी आत्मतत्त्व अत्यन्त | सूक्ष्म होनेके कारण समझमें न आनेसे | शिष्यको जो पुनः पूछनेकी इच्छा | हुई उसका कारण 'न तत्र चक्षुर्गच्छति'