केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ
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३६ केनोपनिषद् [ खण्ड १ ❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧❦❧ पद-भाष्य
| विदिक्रियाकर्मभूतं क्वचित् किञ्चित्कस्यचिद्विदितं स्यादिति । | वस्तु कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी-को ज्ञात है उसीको 'विदित' कहते |
| सर्वमेव व्याकृतं विदितमेव; तस्मादन्यदेवेत्यर्थः । | हैं । अतः सम्पूर्ण व्याकृत वस्तु 'विदित' ही है । उस [विदित वस्तु] से ब्रह्म पृथक् ही है—यह इसका तात्पर्य है । |
| अविदितमज्ञातं तर्हीति प्राप्ते आह—अथो अपि अविदिताद् विदितविपरीतादव्याकृताविद्या- | तो फिर ब्रह्म अज्ञात है—ऐसा प्राप्त होनेपर कहते हैं—'वह अविदित—विदितसे विपरीत व्याकृत पदार्थोंकी बीजभूत अविद्यारूप |
वाक्य-भाष्य
| तर्ह्यविदितम् । | पूर्व०—तो फिर ब्रह्म अज्ञात हुआ ? |
| न; विज्ञानानपेक्षत्वात् । यद्ध्य- | सिद्धान्ती–नहीं, क्योंकि उसे विज्ञान (ज्ञात होने) की अपेक्षा नहीं है । |
| [ब्रह्मणः स्वीय प्रकाशने अन्यानपेक्षत्वम्] विदितं तद्विज्ञानापेक्षम् । अविदितविज्ञानाय हि लोकप्रवृत्तिः । इदं तु | जो वस्तु अज्ञात होती है उसके विज्ञानकी अपेक्षा हुआ करती है । अज्ञात वस्तुको जाननेके लिये ही सम्पूर्ण लोकोंकी प्रवृत्ति है, किन्तु ब्रह्मको |
| विज्ञानानपेक्षं । कस्मात् ? विज्ञानस्वरूपत्वात् । न हि यस्य यत्स्वरूपं | अपने विज्ञानकी अपेक्षा नहीं है; क्यों ? क्योंकि वह विज्ञानस्वरूप ही है । जिसका जो स्वरूप होता है वह |
| तत्त्वेनान्यतोऽपेक्ष्यते । न च स्वत एवापेक्षा अनपेक्षमेव सिद्धत्वात् । प्रदीपः स्वरूपाभिव्यक्तौ | उसीकी दूसरेसे अपेक्षा नहीं रखता और अपनेसे तो अपेक्षा हुआ ही नहीं करती, क्योंकि अपना-आप तो सिद्ध (प्राप्त) होनेके कारण अपेक्षासे रहित ही है । दीपक अपने स्वरूपकी |
| न प्रकाशान्तरमन्यतोऽपेक्षते स्वतो वा । यद्ध्यनपेक्षं तत्स्वत एव सिद्धम् प्रकाशात्मकत्वात् | अभिव्यक्तिके लिये अपनेसे अथवा किसी अन्यसे प्रकाशान्तरकी अपेक्षा नहीं रखता । इस प्रकार जो अपेक्षा नहीं रखता वह स्वतः सिद्ध ही है । दीपक प्रकाशस्वरूप ही है; अतः अपने स्वरूपकी अभिव्यक्तिके लिये |
| प्रदीपस्यापेक्षितोऽप्यनर्थकः स्यात्, | यदि वह प्रकाशान्तरकी अपेक्षा करे |