भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 152 में से

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पृष्ठ 45

खण्ड १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७ पद-भाष्य लक्षणाद्व्याकृतबीजात्, अधि | अव्याकृतसे भी 'अधि' है।"'अधि' का इति उपर्येर्थे, लक्षणया अन्यद् | अर्थ ऊपर होता है; परन्तु लक्षणासे इत्यर्थः । यद्धि यस्मादधि उपरि | इसका अर्थ 'अन्य' करना चाहिये, क्योंकि जो वस्तु जिससे अधि— भवति, तत्तस्मादन्यदिति | ऊपर होती है वह उससे अन्य हुआ प्रसिद्धम् । | करती है—यह प्रसिद्ध ही है । वाक्य-भाष्य प्रकाशे विशेषाभावात् । न हि | तो व्यर्थ ही होगा, क्योंकि प्रकाशमें प्रदीपस्य स्वरूपाभिव्यक्तौ प्रदोप- | कोई विशेषता नहीं हुआ करती। एक दीपकके स्वरूपकी अभिव्यक्तिमें किसी प्रकाशोऽर्थवान् । न चैवमात्म- | अन्य दीपकका प्रकाश सार्थक नहीं नोऽन्यत्र विज्ञानमस्ति येन | होता। इसी प्रकार आत्मासे भिन्न ऐसा कोई विज्ञान नहीं है जो उसके स्वरूपविज्ञानेऽप्यपेक्ष्येत । | स्वरूपका ज्ञान करानेके लिये अपेक्षित हो । विरोध इति चेन्नान्यत्वात् । | यदि कहो कि इससे विरोध प्रतीत स्वरूपविज्ञाने विज्ञानस्वरूपत्वाद् | होता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि [ आत्मा ] इससे भिन्न है । विज्ञानान्तरं नापेक्षत इत्येतदसत् । | पूर्व०-तुमने जो कहा कि आत्मा विज्ञानस्वरूप है, इसलिये उसके दृश्यते हि विपरीतज्ञानमात्मनि | स्वरूपको जाननेमें किसी अन्य विज्ञान- सम्यग्ज्ञानं च । न जानाम्यात्मा- | की अपेक्षा नहीं है—सो ठीक नहीं, क्योंकि आत्मामें भी विपरीत ज्ञान नमिति । श्रुतेश्च “तत्त्वमसि” | और सम्यक् ज्ञान होता देखा ही जाता (छा० उ० ६।८-१६) "आत्मा- | है; जैसा कि "मैं आत्माको नहीं जानता" इत्यादि कथनसे तथा "तू वह नमेवावेत्" (बृ० उ० १।४।१०) | (ब्रह्म) है" "आत्माको ही जाना"