केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें३८ केनोपनिषद् [ खण्ड १ ❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦❦ पद-भाष्य
यद्विदितं तदल्पं मर्त्यं दुःखा- | जो वस्तु विदित होती है वह [ब्रह्मण] त्मकं चेति हेयम् । | अल्प, मरणशील एवं दुःखमयी होती [आत्मभिन्नत्व-] तस्माद्विदितादन्यद्ब्रह्म | है, इसलिये वह हेय (त्याज्य) है । [प्रतिपादनम्] इत्युक्ते त्वहेयत्वमुक्तं | ब्रह्म उस विदित वस्तुसे भिन्न है— स्यात् । तथा अविदितादधि | ऐसा कहनेसे उसका अहेयत्व इत्युक्तेऽनुपादेयत्वमुक्तं स्यात् । | बतलाया गया । तथा ‘वह अविदित- | से भी ऊपर है' ऐसा कहनेपर उसका | अनुपादेयत्व प्रतिपादन किया गया ।
वाक्य-भाष्य
“एतं वै तमात्मानं विदित्वा” | “उस इस आत्माको निश्चयपूर्वक जान- (बृ० उ० ३ । ५ । १) इति च । | कर” आदि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है । सर्वत्र श्रुतिष्वात्मविज्ञाने विज्ञा- | श्रुतियोंमें आत्माके ज्ञानके लिये सर्वत्र नान्तरापेक्षत्वं दृश्यते । तस्मात् | ही विज्ञानान्तरकी अपेक्षा देखी जाती प्रत्यक्षश्रुतिविरोध इति चेत् । | है । इसलिये [ उपर्युक्त कथनका ] न; कस्मात् ? अन्यो हि स | प्रत्यक्ष ही श्रुतिसे विरोध है । आत्मा बुद्ध्यादिकार्यकरणसङ्घा- | सिद्धान्ती-ऐसा कहना ठीक नहीं । ताभिमानसन्तानाविच्छेद लक्षणो- | क्यों ? क्योंकि बुद्धि आदि कार्य और ऽविवेकात्मको बुद्धयवभासप्रधानः | करणके संघातमें जो अभिमान है उसकी चक्षुरादिकरणो नित्यचित्स्वरू- | परम्पराका विच्छेद न होना ही जिसका पात्मान्तःसारो यत्रानित्यं विज्ञानम् | लक्षण है, नित्य चित्स्वरूप आत्मा ही अवभासते । बौद्धप्रत्ययानाम् आ- | जिसका आन्तरिक सार है और जिसमें विर्भावतिरोभावधर्मकत्वात्तद्धर्म- | अनित्य विज्ञानका अवभास हुआ तयैव विलक्षणमपि चावभासते । | करता है यह अविवेकात्मक, चिदाभास- | प्रधान तथा चक्षु आदि करणोंवाला | आत्मा ( जीवात्मा ) [ शुद्ध चेतनसे ] | भिन्न ही है । बौद्ध प्रतीतियोंका | आविर्भाव-तिरोभाव उसका धर्म है; | अतः अपने उस धर्मके कारण वह उस- | से पृथक् दिखलायी भी देता है ।