केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 6, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ें( २ ) इस उद्धरणसे सिद्ध होता है कि भगवान् भाष्यकारने पहले पद- भाष्यकी रचना की थी। उसमें उपनिषदर्थकी पदशः व्याख्या तो हो गयी थी; परन्तु युक्तिप्रधान वाक्योंसे उसके तात्पर्यका विवेचन नहीं हुआ था। इसीलिये उन्हें वाक्य-भाष्य लिखनेकी आवश्यकता हुई। पद-भाष्यकी रचना अन्य भाष्योंके ही समान है। वाक्य-भाष्यमें जहाँ- तहाँ और विशेषतया तृतीय खण्डके आरम्भमें युक्ति-प्रयुक्तियोंद्वारा परमतका खण्डन और स्वमतका स्थापन किया गया है। ऐसे स्थानोंमें भाष्यकारकी यह शैली रही है कि पहले शङ्का और उसके उत्तरको एक सूत्रसदृश वाक्यसे कह देते हैं और फिर उसका विस्तार करते हैं; जैसे प्रस्तुत पुस्तकके पृष्ठ ३ पर 'कर्मविषये चानुक्तिः तद्विरोधित्वात्' ऐसा कहकर फिर 'अस्य विजिज्ञासितव्यस्यात्मतत्त्वस्य कर्मविषयेऽवचनम्' इत्यादि ग्रन्थसे इसीकी व्याख्या की गयी है। इस प्रकार हम देखते हैं कि पद-भाष्यमें प्रधानतया मूलकी पदशः व्याख्या की गयी है और वाक्य-भाष्यमें उसपर विशेष ध्यान न देकर विषयका युक्तियुक्त विवेचन करनेकी चेष्टा की गयी है। अँग्रेजी और बँगलामें जो उपनिषद्-भाष्यके अनुवाद प्रकाशित हुए हैं उनमें केवल पद-भाष्यका ही अनुवाद किया गया है, पण्डितवर श्रीपीताम्बरजीने जो हिन्दी-अनुवाद किया था उसमें भी केवल पद-भाष्य ही लिया गया था। मराठी-भाषान्तरकार परलोकवासी पूज्यपाद पं० श्रीविष्णुवापट शास्त्रीने केवल वाक्य-भाष्यका अनुवाद किया है। हमें तो दोनों ही उपयोगी प्रतीत हुए; इसलिये दोनोंहीका अनुवाद प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवादोंकी छपाईमें जो क्रम रक्खा गया है उससे उन दोनोंको तुलनात्मक दृष्टिसे पढ़नेमें बहुत सुभीता रहेगा। आशा है, हमारा यह अनधिकृत प्रयास पाठकोंको कुछ रुचिकर हो सकेगा। विनीत, अनुवादक