केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 63, कुल 152 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५५ पद-भाष्य प्रतिवचनोक्त्या ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ | ‘श्रोत्रस्य श्रोत्रम्’ इत्यादि प्रश्नोत्तरों- इत्यादि । ‘यद्वाचानभ्युदितम्’ | द्वारा उसीका प्रतिपादन किया गया इति च विशेषतोऽवधारितम् । | है । उसीको ‘यद्वाचानभ्युदितम्’ ब्रह्मवित्सम्प्रदायनिश्चयश्चोक्तः | इस वाक्यद्वारा विशेषरूपसे निश्चय ‘अन्यदेव तद्विदितादथो अवि- | किया है । ‘वह विदितसे अन्य है दितादधि’ इति । उपन्यस्तमुप- | और अविदितसे भी ऊपर है’ इस संहरिष्यति च ‘अविज्ञातं वि- | वाक्यद्वारा ब्रह्मवेत्ताओंके सम्प्रदाय- जानतां विज्ञातमविजानताम्’ | का निश्चय भी बतलाया गया है; इति । तस्माद्युक्तमेव शिष्यस्य सु | तथा इस प्रकार उल्लेख किये हुए वेदेति बुद्धिं निराकर्तुम् । | प्रकरणका ‘अविज्ञातं विजानतां न हि वेदिता वेदितुर्वेदितुं | विज्ञातमविजानताम्’ इस वाक्यद्वारा शक्यः अग्निर्द्धग्धुरिव दग्धुमग्नेः । | उपसंहार करेंगे । अतः ‘मैं अच्छी | तरह जानता हूँ’ ऐसी शिष्यकी | बुद्धिका निराकरण करना उचित | ही है । | जिस प्रकार जलानेवाले अग्नि- | द्वारा स्वयं अग्नि नहीं जलाया जा | सकता उसी प्रकार जाननेवालेके वाक्य-भाष्य यदि मन्यसे सुवेद इति | ‘यदि मन्यसे सुवेद’ इत्यादि वाक्यसे शिष्यबुद्धिविचालना गृहीत- | जो शिष्यकी बुद्धिको विचलित करना स्थिरतायै । विदिताविदि- | है वह उसके ग्रहण किये हुए अर्थको ताभ्यां निवर्त्य बुद्धिं शिष्यस्य | स्थिर करनेके लिये ही है । शिष्यकी स्वात्मन्यवस्थाप्य तदेव ब्रह्म त्वं | बुद्धिको ज्ञात और अज्ञात वस्तुओंसे विद्धीति स्वाराज्येऽभिषिच्य | हटाकर ‘तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि’ (उसीको उपास्यप्रतिषेधेनाथास्य बुद्धिं | तू ब्रह्म जान ) इस कथनसे अपने विचालयति । | आत्मस्वरूपमें स्थिर कर तथा उपास्यके | प्रतिषेधद्वारा उसे स्वाराज्यपर अभिषिक्त- | कर अब उसकी बुद्धिको विचलित | करते हैं ।