भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 152 में से

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पृष्ठ 83

खण्ड २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ७५


पद-भाष्य

पायवर्जितदृक्स्वरूपता नित्यत्वं | उसका वृद्धिक्षयशून्य साक्षित्व, विशुद्धस्वरूपत्वमात्मत्वं निर्वि- | नित्यत्व, विशुद्धस्वरूपत्व, आत्मत्व, शेषतैकत्वं च सर्वभूतेषु सिद्धं | निर्विशेषत्व और सम्पूर्ण भूतोंमें [ अनुस्यूत ] एकत्व सिद्ध हो सकता भवेत् ; लक्षणभेदाभावाद्द्योम्न | है, जिस प्रकार कि लक्षणोंमें भेद न होनेके कारण घट, पर्वत और गुहादि- इव घटगिरिगुहादिषु । विदिता- | में आकाशका अभेद है। इस प्रकार विदिताभ्यामन्यद्ब्रह्मेत्यागम- | 'ब्रह्म विदित और अविदित—दोनोंहीसे भिन्न है' इस शास्त्रवचनके वाक्यार्थ एवं परिशुद्ध एवोपसंहृतो | अर्थका ही भली प्रकार शोधन करके यहाँ उपसंहार किया गया है। इसके भवति । “दृष्टेर्द्रष्टा श्रुतेः श्रोता | सिवा “वह दृष्टिका द्रष्टा है, श्रवणका श्रोता है, मतिका मनन करने- मतेर्मन्ता विज्ञातेर्विज्ञाता” इति | वाला है और विज्ञातिका विज्ञाता है” ऐसी एक दूसरी श्रुति भी है। हि श्रुत्यन्तरम् । | [ उससे भी यही सिद्ध होता है ]।

वाक्य-भाष्य

तया यद्विदितं तद्ब्रह्म तदेव मतं | स्वरूपसे जाना जाता है वही ब्रह्म है, ज्ञातं तदेव सम्यग्ज्ञानवत्प्रत्यगा- | वही माना हुआ अर्थात् ज्ञात है तथा वही सम्यग्ज्ञानके सहित प्रत्यगात्माका त्मविज्ञानम्, न विषयविज्ञानम् । | ज्ञान है; विषयज्ञान सम्यग्ज्ञान नहीं है। आत्मत्वेन प्रत्यगात्मानमैक्ष- | ‘प्रत्यगात्माको आत्मस्वरूपसे देखा’ दिति च काठके । | ऐसा कठोपनिषद्में कहा है। ‘अमृतत्वं (आत्मज्ञानं अमृतत्व-निमित्तम्) 'अमृतत्वं हि विन्दते' | हि विन्दते’ (आत्मज्ञानसे अमरत्व ही प्राप्त होता है) यह हेतुसूचक वाक्य इति हेतुवचनम्;विपर्यये | है, क्योंकि इससे विपरीत ज्ञानसे मृत्युप्राप्तेः । विषया- | मृत्युकी प्राप्ति होती है। बुद्धि आदि त्मविज्ञाने हि मृत्युः प्रारभत | विषयोंमें आत्मत्व बोध होनेसे ही