भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

७८ केनोपनिषद् [ खण्ड २ पद-भाष्य “प्रज्ञानं ब्रह्म” (ऐ० उ० ५।३) | “प्रज्ञान ब्रह्म है” इत्यादि श्रुतियाँ इत्याद्याः श्रुतयो बाधिताः स्युः । | बाधित हो जाती हैं। निरवयव होनेके आत्मनो निरवयवत्वेन प्रदेशा- | कारण आत्मामें कोई देशविशेष नहीं भावात् नित्यसंयुक्तत्वाच्च मनसः | है; और उससे मनका नित्यसंयोग है; स्मृत्युत्पत्तिनियमानुपपत्तिरपरि- | इस कारण उसमें स्मृतिकी उत्पत्तिके हार्या स्यात् । संसर्गधर्मित्वं | नियमकी अनुपपत्ति अनिवार्य हो चात्मनः श्रुतिस्मृतिन्यायविरुद्धं | जाती है तथा श्रुति, स्मृति और कल्पितं स्यात् । “असङ्गो न हि | युक्तिसे विरुद्ध आत्माके संसर्गधर्मी सज्जते” (बृ० उ० ३ । ९ । २६) | होनेकी कल्पना भी होती है। “असङ्ग “असक्तं सर्वभृत्” (गीता १३ । | [आत्मा] का किसीसे संग नहीं १४) इति हि श्रुतिस्मृती । | होता” “संगरहित और सबका पालन न्यायश्च—गुणवद्गुणवता सं- | करनेवाला है” ऐसी श्रुति और स्मृति सृज्यते, नातुल्यजातीयम् । अतः | प्रसिद्ध हैं। युक्तिसे भी जो वस्तु निर्गुणं निर्विशेषं सर्वविलक्षणं केन- | सगुण होती है उसीका गुणवान्‌से चिदप्यतुल्यजातीयेन संसृज्यत | संसर्ग होता है; विजातीय वस्तुओं- इत्येतत् न्यायविरुद्धं भवेत् । | का संयोग कभी नहीं होता । अतः तस्मात् नित्यालुप्तज्ञानस्वरूप- | निर्गुण निर्विशेष और सबसे विलक्षण आत्माका किसी भी विजातीय वस्तुसे संयोग होता है—ऐसा मानना न्यायविरुद्ध होगा । अतः नित्य अविनाशी ज्ञानस्वरूप प्रकाश- वाक्य-भाष्य अनात्मविज्ञानं निवर्तयन्ती सा | कि वह अनात्मविज्ञानको निवृत्त तन्निवृत्त्या स्वाभाविकस्यामृत- | करती हुई उसकी निवृत्तिके द्वारा त्वस्य निमित्तमिति कल्प्यते । | स्वाभाविक अमृतत्वकी हेतु बनती है, यत आह 'वीर्यं विद्यया विन्दते' । | क्योंकि [अगले वाक्यसे] 'विद्यासे [अज्ञानान्धकारको निवृत्त करनेका] सामर्थ्य प्राप्त होता है' ऐसा कहा भी है।