भारतकोश
केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)

Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished152 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ८७ तृतीय खण्ड यक्षोपाख्यान वाक्य-भाष्य ब्रह्म ह देवेभ्य इति ब्रह्मणो दुर्विज्ञेयतोत्कीर्त्यता- 'ब्रह्म ह देवेभ्यो' इत्यादि वाक्यसे [ आरम्भ होनेवाली आख्यायिकाके यक्षोपाख्यानस्य- दुर्विज्ञेयतोत्कीर्त्यता- द्वारा ] जो ब्रह्मकी दुर्विज्ञेयता बतलायी प्रयोजने विवक्ष्यार्था। समाप्ता गयी है वह, ब्रह्मप्राप्तिके लिये अधिक विकल्पाः ब्रह्मविद्या यदधीनः यत्न करना चाहिये—इस प्रयोजनके पुरुषार्थः । अत लिये है। जिसके अधीन पुरुषार्थ है ऊर्ध्वमर्थवादेन ब्रह्मणो दुर्विज्ञेय- वह ब्रह्मविद्या तो समाप्त हो गयी। अब आगे अर्थवादद्वारा ब्रह्मकी तोच्यते । तद्विज्ञाने कथं नु नाम दुर्विज्ञेयता बतलायी जाती है, जिससे यत्नमधिकं कुर्यादिति । कि उसे प्राप्त करनेके लिये मनुष्य किसी-न-किसी तरह अधिक यत्न करे। शमाद्यर्थो वाम्नायोऽभिमान- अथवा यह श्रुतिभाग अभिमानका शातनात् । शमादि वा ब्रह्म- नाश करनेवाला होनेसे शमादिकी प्राप्ति- विद्यासाधनं विधित्सितं तदर्थोऽय- के लिये हो सकता है। या शमादिको ब्रह्मविद्याका साधन बतलाना इष्ट है, मर्थवादाम्नायः । न हि शमादि- अतः उसीके लिये यह अर्थवाद-श्रुति साधनरहितस्याभिमानरागद्वेषा- है। जो पुरुष शमादि साधनसे रहित तथा अभिमान और राग-द्वेषादिसे युक्तस्य ब्रह्मविज्ञाने सामर्थ्य- युक्त है उसका ब्रह्मज्ञानकी प्राप्तिमें मस्ति। व्यावृत्तबाह्यमिथ्याप्रत्यय- सामर्थ्य नहीं हो सकता, क्योंकि ब्रह्म बाह्य मिथ्या प्रतीतियोंके निरसनद्वारा ग्राह्यत्वाद्वह्मणः । यस्माच्चा- ही ग्रहण किया जाने योग्य है। यह ग्न्यादीनां जयाभिमानं शातयति। आख्यायिका अग्नि आदिके विजय- सम्बन्धी अभिमानको नष्ट करती है, ततश्च ब्रह्मविज्ञानं दर्शयत्यभि- इसलिये अभिमानके शान्त होनेपर ही मानोवशमे । तस्माच्छमादि- ब्रह्मज्ञानकी प्राप्ति दिखलाती है। अतः इसका सारांश यह हुआ कि यह साधनविधानार्थोऽयमर्थवाद इत्य- अर्थवाद शमादि साधनोंका विधान वसीयते । करनेके लिये ही है।