केनोपनिषद् (पदभाष्य व वाक्यभाष्य सहित)
Kena Upanishad with Pada & Vakya Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
१३८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४
१३८ केनोपनिषद् [ खण्ड ४ पद-भाष्य अपहत्य पाप्मानम् अविद्याकाम- | ब्रह्ममें, जो ज्येये—बड़ा अर्थात् कर्मलक्षणं संसारबीजं विधूय | सबसे महान् है उस अपने मुख्य अनन्ते अपर्यन्ते स्वर्गे लोके | आत्मामें स्थित हो जाता है। सुखात्मके ब्रह्मणीत्येतत् । अनन्ते | तात्पर्य यह है कि वह फिर संसार- इति विशेषणान्न त्रिविष्टपे अनन्त- | को प्राप्त नहीं होता । 'अमृतत्वं हि शब्द औपचारिकोडपि स्याद् | विन्दते' इस वाक्यद्वारा पहले इत्यत आह--ज्येये इति । ज्येये | ब्रह्मविद्याका फल कह भी दिया है, ज्यायसि सर्वमहत्तरे स्वात्मनि | तो भी इस वाक्यद्वारा उसका अन्तमें मुख्ये एव प्रतितिष्ठति । न पुनः | फिर उपसंहार करते हैं। 'अनन्त' ऐसा संसारमापद्यत इत्यभिप्रायः ॥९॥ | विशेषण होनेके कारण 'स्वर्गे लोके' से देवलोक नहीं समझना चाहिये; क्योंकि उसमें भी उपचारसे 'अनन्त' शब्दकी प्रवृत्ति हो सकती है इसलिये 'ज्येये' यह विशेषण दिया गया है ॥ ९ ॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ केनोपनिषत्पदभाष्यम् सम्पूर्णम् वाक्य-भाष्य परे ब्रह्मणि ज्येये महति सर्व- | ज्येष्ठ—महान् यानी सबसे बड़े परब्रह्म- महत्तरे प्रतितिष्ठति सर्ववेदान्तवेद्यं | में प्रतिष्ठित हो जाता है। अर्थात् ब्रह्मात्मत्वेनावगम्य तदेव ब्रह्म | सम्पूर्ण वेदान्तवाक्योंसे वेद्य ब्रह्मको प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ९ ॥ | आत्मभावसे जानकर उसी ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है ॥ ९ ॥ इति चतुर्थः खण्डः ॥ ४ ॥ केनोपनिषद्वाक्यभाष्यम् सम्पूर्णम्
शान्तिपाठ
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिरा- करणं मेऽस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥
समाप्त
केनो० ६—
मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका
ओंहरिः मन्त्राणां वर्णानुक्रमणिका मन्त्रप्रतीकानि \t खं० \t सं० \t पृ० अथ वायुमब्रुवन्वायवेतत् \t ... \t ३ \t ७ \t ११२ अथाध्यात्मं यदेतत् \t ... \t ४ \t ५ \t १२३ अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन् \t ... \t ३ \t ११ \t ११४ इह चेदवेदीदथ \t ... \t २ \t ५ \t ८४ उपनिषदं भो ब्रूहि \t ... \t ४ \t ७ \t १२८ ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः \t ... \t १ \t १ \t १४ तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत् \t ... \t ३ \t ४ \t १०९ ” \t ... \t ३ \t ८ \t ११२ तद्व तद्वनं नाम \t ... \t ४ \t ६ \t १२६ त ऐक्षन्तास्माकमेवायम् \t ... \t ३ \t २ \t १०५ तस्माद्वा इन्द्रोऽतितराम् \t ... \t ४ \t ३ \t ११९ तस्माद्वा एते देवाः \t ... \t ४ \t २ \t ११८ तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यम् \t ... \t ३ \t ५ \t ११० ” \t ... \t ३ \t ९ \t ११२ तस्मै तृणं निदधौ \t ... \t ३ \t ६ \t १११ ” \t ... \t ३ \t १० \t ११२ तस्यै तपो दमः कर्मेति \t ... \t ४ \t ८ \t १३३ तस्यैष आदेशो यदेतत् \t ... \t ४ \t ४ \t १२० तेऽग्निमब्रुवञ्जातवेदः \t ... \t ३ \t ३ \t १०९ न तत्र चक्षुर्गच्छति \t ... \t १ \t ३ \t ३१ नाहं मन्ये सुवेदेति \t ... \t २ \t २ \t ६३ प्रतिबोधविदितम् \t ... \t २ \t ४ \t ७३ ब्रह्म ह देवेभ्यः \t ... \t ३ \t १ \t १०४ यच्चक्षुषा न पश्यति \t ... \t १ \t ६ \t ५१ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति \t ... \t १ \t ७ \t ५२ यत्प्राणेन न प्राणिति \t ... \t १ \t ८ \t ५२ यदि मन्यसे सुवेदेति \t ... \t २ \t १ \t ५६ यद्वाचानभ्युदितं येन \t ... \t १ \t ४ \t ४५ यन्मनसा न मनुते \t ... \t १ \t ५ \t ४९ यस्यामतं तस्य मतम् \t ... \t २ \t ३ \t ६८ यो वा एतामेवम् \t ... \t ४ \t ९ \t १३७ श्रोत्रस्य श्रोत्रम् \t ... \t १ \t २ \t २० स तस्मिन्नेवाकाशे \t ... \t ३ \t १२ \t ११५ सा ब्रह्मेति होवाच \t ... \t ४ \t १ \t ११७
कल्याणके पुनर्मुद्रित विशेषाङ्क कल्याण वर्ष | सन् | नाम ८ | १९३४ | शिवाङ्क ९ | १९३५ | शक्ति-अङ्क १० | १९३६ | योगाङ्क १२ | १९३८ | संत-अङ्क १५ | १९४१ | साधनाङ्क १९ | १९४५ | सं० पद्मपुराणाङ्क २१ | १९४७ | सं० मार्कण्डेय-ब्रह्मपुराणाङ्क २२ | १९४८ | नारी-अङ्क २४ | १९५० | हिन्दू-संस्कृति-अङ्क २५ | १९५१ | सं० स्कन्दपुराणाङ्क २६ | १९५२ | भक्त-चरिताङ्क २७ | १९५३ | बालक-अङ्क २८ | १९५४ | सं० नारद-विष्णुपुराणाङ्क ३० | १९५६ | सत्कथा-अङ्क ३१ | १९५७ | तीर्थाङ्क ३४ | १९६० | सं० श्रीमद्देवीभागवताङ्क ३५ | १९६१ | सं० योगवासिष्ठाङ्क ३६ | १९६२ | सं० शिवपुराण ३७ | १९६३ | सं० ब्रह्मवैवर्तपुराणाङ्क ३९ | १९६५ | श्रीभगवन्नाम महिमा | | और प्रार्थना-अङ्क ४३ | १९६९ | परलोक और पुनर्जन्माङ्क ४४-४५ | १९७०-७१ | गर्गसंहिता ४९ | १९७५ | श्रीहनुमान-अङ्क ६७ | १९९३ | शिवोपासनाङ्क
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