किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
पृष्ठ 176, कुल 707 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८ )
अन्त में द्रौपदी को भी हार गये। भरी सभा में द्रौपदी का अपमान किया। क्रुद्ध भीम ने दुःशासन का रक्त पीने एवं दुर्योधन की जाँघ तोड़ने की प्रतिज्ञा की। उनकी प्रतिज्ञा की सूचना पाकर चतुर धृतराष्ट्र ने उन्हें बुलाकर फिर उनका राज्य वापस कर दिया। अपने इस षड्यन्त्र में भी असफल होने पर दुर्योधन ने फिर उन्हें द्यूतक्रीड़ा के लिये आमन्त्रित किया। इस बार शर्त यह रही की हारने वाला बारह वर्ष तक वनवास एवं एक वर्ष तक अज्ञातवास करेगा। यदि तेरहवें वर्ष में वह पहचान लिया जाय तो फिर उसी प्रकार १३ वर्ष और व्यतीत करने पड़ेंगे। पाण्डव इस बार भी हार गये। अपने भाइयों एवं पत्नी को साथ लेकर युधिष्ठिर ने वन की राह ली। महाकाव्य की कथा वहीं से प्रारम्भ होती है।
'महाकाव्य की कथा—द्वैतवन में निवास करते हुए युधिष्ठिर ने दुर्योधन की नीति एवं शासन-व्यवस्था जानने के लिये एक वनेचर को दूत के रूप में भेजा। ब्रह्मचारी वेष में वह वनेचर दुर्योधन के राज्य का सम्पूर्ण वृत्तान्त जानकर युधिष्ठिर के पास लौट आया।
श्रियः कुरुणामधिपस्य पालनीं प्रजासु वृत्तिं यमयुक्त वेदितुम्।
स वर्णिलिङ्गी विदितः समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः॥
— कि. सर्गः १, श्लोक १.
वनेचर दुर्योधन के राज्य का सम्पूर्ण हाल बताता है कि किस प्रकार कपट से जीती हुई पृथ्वी को दुर्योधन नीति से जीत लेना चाहता है। सारी बातें बताकर वनेचर लौट जाता है। शत्रु के अभ्युदय का समाचार सुनकर एवं अपने पतियों की दुर्दशा देखकर द्रौपदी अत्यन्त ही दुःखित होती है। वह धर्मराज को उत्तेजित करने के लिये एवं शत्रु से शीघ्र बदला लेने के लिये नीतियुक्त वचन कहती है। तत्पश्चात् भीम भी द्रौपदी के सलाह की पुष्टि करते हैं और अपने बाहुबल के प्रयोग करने की आतुरता प्रदर्शित करते हैं। नीति विशारद युधिष्ठिर अपने वचनों से भीम को शान्त कर देते हैं एवं उन्हें शान्तिपूर्वक उपयुक्त समय की प्रतीक्षा करने का उपदेश देते हैं। इसी बीच भगवान् व्यास आते हैं वे अर्जुन को दिव्यास्त्र-प्राप्ति के लिये इन्द्र की तपस्या करने को कहते हैं। व्यास के भेजे गये गुह्यक के साथ अर्जुन इन्द्रकील पर्वत पर पहुँचते हैं। अर्जुन की कठिन तपस्या से डरकर इन्द्र तपस्या भङ्ग करने के लिये अप्सराओं को भेजते हैं जैसा वे बराबर करते-रहते हैं। किन्तु उससे भी जब अर्जुन का व्रत भंग नहीं होता है। तब स्वयं इन्द्र उन्हें शिव की तपस्या करने का उपदेश देते हैं। अर्जुन पुनः तपस्या करते हैं। इधर एक मायावी दैत्य अर्जुन को मारने के लिये सूअर का रूप धारण करता है। इस बात को जानकर भगवान् शिव भी अर्जुन की रक्षा के हेतु किरात का मायावी वेश धारण करते हैं। किरात और अर्जुन दोनों सूअर पर एक साथ ही बाण छोड़ते हैं। बाण के लिये—अर्जुन एवं किरात में विवाद चलता है और फिर युद्ध चल पड़ता है। अस्त्र-शस्त्रों के बाद वे मल्लयुद्ध पर