भारतकोश
किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

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( १० )

उन्होंने शिवमूर्ति पर चढ़ायी थी और उसी के कारण शिव को पहचान लेते हैं। 'किरातार्जुनीयम्' के अनुसार जब द्वन्द्व युद्ध में अर्जुन शिव का पैर पकड़ते हैं तो शिव प्रसन्न होकर उन्हें हृदय से लगा देते हैं, प्रकट होते हैं एवं पाशुपतास्त्र प्रदान करते हैं ।

( ७ ) इसके अतिरिक्त भारवि ने अर्जुन की तपस्या का, वनस्थली एवं वन का तथा नाना दृश्यों का सजीव वर्णन कर 'किरातार्जुनीयम्' को कमनीय एवं मनोरम कलेवर प्रदान किया है ।

५. कवि एवं काव्य की समीक्षा

महाकवि भारवि, निःसन्देह एक उच्चकोटि के कवि हैं। उनका एकमात्र महाकाव्य 'किरातार्जुनीयम्' पञ्चमहाकाव्यों में एक है। महाकवि भारवि कलापक्ष के कवि हैं परन्तु अन्य कलावादी कवियों यथा माघ के समान न तो इनमें शब्द एवं अर्थ का उतना गाम्भीर्य है और न श्रीहर्ष की तरह प्रौढोक्ति को लम्बी उड़ान एवं पदलालित्य । उनकी महत्त्वपूर्ण विशेषता है उनका अर्थगौरव । अर्थ के गाम्भीर्य पर ही उनका ध्यान रहा है और इसमें वे सफल भी हैं। पण्डितों की उक्ति 'भारवेरर्थगौरवम्' उनके इसी गुण के कारण है। शब्दों की क्रीडा के फेर में वे हमेशा नहीं पड़ते। उनके काव्य की मान्यता उन्हीं के शब्दों में देखनी हो तो हम निम्न श्लोक से समझ सकते हैं :—

स्फुटता न पदैरपाकृता न च न स्वीकृतमर्थगौरवम् ।
रचिता पृथगर्थता गिरां न च सामर्थ्यमपोहितं क्वचित् ॥ २।२७ ॥

काव्य में अस्पष्टता का बहिष्कार, अर्थगौरव पर विशेष ध्यान एवं वाणी के अर्थ में पौनरुक्त्य से परहेज रखना ही उन्हें अभीष्ट था और यही विशेषता है 'किरातार्जुनीयम्' की कला की। कालिदास के महाकाव्यों से घटनाचक्र अविरल मैदान' नदी की गति के समान मन्थर गति से चलता है। उसमें अवरोध नहीं है, स्थान-स्थान पर सुन्दर वर्णन आते हैं और पाठक उनमें खो जाता है। कालिदास पाठक की मनोवैज्ञानिक स्थिति को पहचानते हैं और इसके पहले कि पाठक एक वर्णन से ऊबे वे आगे बढ़ जाते हैं। भारवि में ऐसी बात नहीं। किसी विषय को लेकर जब तक अपना सम्पूर्ण दिमाग खाली नहीं कर लेते हैं वे आगे नहीं बढ़ते हैं। अलंकारों, कल्पनाओं एवं शब्दों का आडम्बर खड़ा कर देते हैं। यही कारण है कि पाठक ऊब जाता है। भारवि में ऐसे स्थलों का अभाव नहीं है, तब उनका अनावश्यक लम्बा वर्णन खटकता है। अप्सराओं के आगमन एवं विहार का ही वर्णन चार सर्गों में करके कवि ने अपनी इस विशेषता का परिचय दिया है। तेरहवें सर्ग में भी किरात के मुख से जो वचन भारवि ने कहलाये हैं उनमें अजीब व्यतिक्रम एवं अनावश्यक वर्णन का आभास मिल सकता है।