भारतकोश
किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

महाकवि भारवि द्वारा

स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)

DevanagariHindipublished707 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 707 में से

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भारवि की शाब्दी क्रीडा उनका एक अन्य दोष है जो सहृदय पाठक को खटके बिना नहीं रह सकता। ऐसी ही शाब्दी क्रीडा का उदाहरण है किराताजुर्नीयम् का १५ वाँ सर्ग जो चित्रालंकार से परिपूर्ण है, इसी कारण मल्लिनाथ ने कहा है कि 'नारिकेलफलसंमितं वचो भारवेः' प्रो० कीथ का कथन है—

‘Bharavi, however, is guilty of error tastes from which Kalidasa is free. Especially in Canto XV he sets himself to try ‘tours deforce of the most foolish kind. redolent of the exce-sses of the Alexandrian poets’

किन्तु महाकवि भारवि की वर्णनात्मक प्रतिभा में सन्देह नहीं किया जा सकता है। वर्णन की सूक्ष्मता के आगे छोटी-छोटी वस्तु का वर्णन करने में भी नहीं चूकते हैं। जिस चित्र का वर्णन करते हैं पूरा जी खोल कर करते हैं, मानों उन्हें स्वयं ही सन्तोष नहीं होता और इसी कारण उनका वर्णन सर्वाङ्गपूर्ण लगता है चाहे वह अप्सराओं की कामकेलियाँ हों या अर्जुन एवं किरात का संघर्ष या भीम और युधिष्ठिर के नीतिवचन। वीर रस के वर्णन में भारवि अद्वितीय हैं। दूसरे सर्ग में भीम के वचनों की सजीवता से वीर रस की सृष्टि उनकी अद्वितीय वर्णन शैली का एक उदाहरण है। वीर रस के वे सिद्धहस्त एवं कुशल कवि हैं। अर्जुन के धनुष खींचने का वर्णन उदाहरण स्वरूप लिया जा सकता है :—

प्रविकर्षणनिनादभिन्नरन्ध्रः पदावष्टम्भनिपीडितस्तदानीम् ।
अभिरोहति गाण्डिवं महेषौ सकलः सशयमारुरोह शैलः ॥ ( १३. १६ )

वर्णन द्वारा जिस प्रकार की सजीवता भारवि-पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करते हैं उसके उदाहरणस्वरूप हम विद्ध सूकर के पृथ्वी पर गिरने का वर्णन पढ़कर जान सकते हैं :—

अथ दीर्घतमं तमः प्रवेक्ष्यन् सहसा रुग्णरयः स संभ्रमेण ।
निपतन्तमिवोष्णरश्मिमुर्व्या बलयीभूततरं धरां च मेने ॥ ( १३. ३० )
स गतः क्षितिमुष्णशोणिताद्र्रः खुरदंष्ट्राग्रनिपातदारिताश्मा ।
असुभिः क्षणवीक्षितेन्द्रसूनुर्विहितामर्षगुरुध्वनिनिरासे ॥ ३१ ॥

प्रकृति वर्णन में भी भारवि सफल हुए हैं। उनका प्रकृति-वर्णन यद्यपि कालिदास के समान मनोरम एवं चित्ताकर्षक नहीं हो सका है किन्तु जितना भी वर्णन किया है उनमें उनकी सूक्ष्म परख का और वर्णन की प्रभावोत्पादकता का परिचय मिलता है। एक-दो उदाहरण प्रस्तुत हैं—

मृणालिनीनामनुरक्षितं त्विषा विभिभ्रमम्भोजपलाशशोभया ।
पयः स्फुरच्छालिशिखापिशङ्गितं द्रुतं धनुखण्डमिवाहिविद्विषः ॥ ( ४. २० )

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