भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 10, कुल 84 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 10

दूसरा उल्लास कुलधर्म का माहात्म्य श्री देवी ने पूछा—हे कुलेश ! आपने कुलधर्म के सम्बन्ध में तो बताया, किन्तु उसे पर प्रकाश नहीं डाला। उस सर्व- धर्मोत्तम धर्म का माहात्म्य बताने की कृपा करें। ईश्वर ने उत्तर दिया—हे देवि ! सुनो, जो तुम पूछती हो, उसे मैं कहूँगा। परम्परा के क्रम से आनेवाला और एक मुख से दूसरे मुख में स्थित होनेवाला वह तत्त्व यद्यपि अकथनीय है, तथापि परमार्थ की दृष्टि से मैं उसे कहता हूँ। सबसे उत्तम वेद हैं, वेदों से उत्तम वैष्णव हैं, वैष्णव से उत्तम शैव, शैव से उत्तम दक्षिण, दक्षिण से उत्तम वाम, वाम से उत्तम सिद्धान्त, सिद्धान्त से उत्तम कौल और कौल से उत्तम कोई नहीं है। वेद और आगम रूपी महा समुद्र को ज्ञानरूपी मथानी से मथकर मैंने इस कुलधर्म को प्रकट किया है। कुलधर्म का आश्रय लेकर श्रेष्ठ मनुष्य स्वर्ग से दूसरे लोक को जाकर मोक्षरूपी रत्न को प्राप्त करता है। जो योगी होता है, वह भोगी नहीं होता और जो भोगी होता है, वह योग को नहीं जानता किन्तु कौल भोग और योग दोनों से युक्त है। अतः हे प्रिये ! वह सबसे श्रेष्ठ है। भोग साक्षात् योग का रूप ले लेता है, पातक सुकृत बन जाता है और संसार मोक्ष का साधन हो जाता है; हे कुलेश्वरि ! यही कुलधर्म है। कुलधर्म के महामार्ग से जाकर अविलम्ब ही मुक्तिपुरी में पहुँचा जाता है, इसमें संदेह नहीं। अतएव कौल मार्ग का आश्रय ग्रहण करना चाहिये। लोग चाहे प्रशंसा

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 10, कुल 84 में से · BharatKosha