भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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तीसरा उल्लास ऊर्ध्वाम्नाय और प्रासादपरा मन्त्र की महिमा श्री देवी ने कहा—हे प्रभो ! मैं सर्वोत्तम ऊर्ध्वाम्नाय की महिमा सुनना चाहती हूँ। आप उसके मन्त्र को बताइये। ईश्वर बोले—हे देवि ! सुनो। मैंने अपने पाँच मुखों से— पूर्वाम्नाय, पश्चिमाम्नाय, दक्षिणाम्नाय, उत्तराम्नाय और ऊर्ध्वा- म्नाय—ये पाँच आम्नाय कहे हैं। ये पाँचों मोक्ष-मार्ग के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनमें से प्रत्येक आम्नाय के मन्त्र भुक्ति और मुक्ति के देनेवाले हैं तथा उसके उपमन्त्र भी तत्त्वदायक होने से प्रसिद्ध हैं। संसार के कल्याण की इच्छा से मैंने ही उन सबको कहा है। उन सब मन्त्रों के देवता उन उन फलों को देते हैं। केवल एक आम्नाय को जो जान लेता है, वह मुक्त हो जाता है,इसमें संदेह नहीं। फिर चार आम्नायों के ज्ञाता की क्या बात; साक्षात् शिव हो जाता है। चार आम्नायों के विशेष ज्ञान से भी श्रेष्ठ ऊर्ध्वाम्नाय है। अतएव यदि आत्मसिद्धि की इच्छा है, तो उसी को जानना चाहिये। सब धर्मों से ऊर्ध्व होने के कारण ऊर्ध्वाम्नाय श्रेष्ठ है। निम्न स्थित व्यक्ति को ऊर्ध्वगामी करने से यह ऊर्ध्वाम्नाय कहलाता है। इसका तत्त्व उच्चस्तर का है, यह संसार-सागर को नष्ट करता है और ऊर्ध्वलोक इसकी सेवा करते हैं—अतएव यह ऊर्ध्वाम्नाय कहलाता है। इसलिये हे देवेशि ! मोक्ष के एकमात्र साक्षात् साधन-स्वरूप ऊर्ध्वाम्नाय का ज्ञान प्राप्त करे, जो सब आम्नायों से अधिक फल देनेवाला और पर से भी परे है। पूर्वाम्नाय सृष्टिरूप है