भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 84 में से

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१४ हिन्दी कुलार्णव सर्वभूतदमनाय नमो भ्रामिण्यै नमः कट्यां । मनोन्मनाय नमः मोहिन्यै नमः दक्षपार्श्वे । उन्मनाय नमो जरायै नमः वामपार्श्वे । अंगुष्ठ-कनिष्ठा को मिलाकर उनसे न्यास करे— सद्योजातं प्रपद्यामि सिद्ध्यै नमः दक्षपादतले । सद्योजाताय वै नमः ऋद्ध्यै नमः वामपादतले । भवे लक्ष्म्यै नमः दक्षहस्ततले । भवे धृत्यै नमः वामहस्ततले । नातिभवे मेधायै नमः नासिकायां । भवस्व माम् प्रज्ञायै नमः शिरसि । ॐ भव प्रभायै नमः दक्षबाहौ । उद्भवाय नमः सुधायै नमः वामबाहौ । अब महाषोढान्यास करे, जिसके अन्तर्गत प्रपञ्च, भुवन, मूर्ति, मन्त्र, दैवत और मातृका—ये छः न्यास हैं । यह महा- षोढान्यास सब न्यासों में उत्तम है । इसका क्रम इस प्रकार है— प्रपञ्चन्यास निम्नलिखित प्रत्येक मन्त्र के आदि में ‘ॐ ऐं ह्रीं श्रीं हसौः’ और अन्त में ‘स्हौः श्रीं ह्रीं ऐं ॐ’ लगाकर न्यास करे— अं प्रपञ्चरूपायै श्रियै नमः शिरसि । आं द्वीपरूपायै मायायै नमः मुखवृत्ते ॥ इं जलधिरूपायै कमलायै नमः दक्षनेत्रे । ईं गिरिरूपायै विष्णुवल्लभायै नमः वामनेत्रे ॥ उं पत्तनरूपायै पद्मधारिण्यै नमः दक्षकर्णे । ऊं पीठरूपायै समुद्रतनयायै नमः वामकर्णे ॥