भारतकोश
कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

कुलार्णव तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Kularnava Tantra with Hindi Commentary

भगवान शिव / पं. भद्रशील शर्मा द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished84 पृष्ठ

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पाँचवाँ उल्लास आधार, पात्र और कुलद्रव्य श्री देवी बोलीं—हे कुलेश ! आधारपात्रों का लक्षण और कुलद्रव्य के भेदों तथा माहात्म्य को कहिए। अविधि से जो पाप होता है और सविधि से जो फल मिलता है, हे करुणा- निधे ! मैं वह सब सुनना चाहती हूँ। ईश्वर ने कहा—हे देवि ! सुनो। विना आधार के भ्रंश माना जाता है, जिसे माताएँ स्वीकार नहीं करतीं। अतः विविध आधारों में से किसी एक की रचना कर लेनी चाहिये। आधार त्रिपद, चतुष्पद, षट्पद या वर्तुलाकार बनवाए। पात्र बहुत छोटा, बहुत बड़ा या टूटा-फूटा न ले। स्वर्ण, रौप्य और ताम्र के पात्र सभी सिद्धियों के देनेवाले हैं। शांति- कर्म में चपला पात्र, स्तम्भन में मृण्मय, वश्य में नारिकेल और अभिचार में कूर्मपात्र प्रशस्त है। शङ्खपात्र ज्ञान-प्रदायक है और शुक्तिपात्र से देवी को प्रसन्नता होती है। कपाल, अलावु और पुण्यक्षेत्र के पात्र सब पापों का हरण करनेवाले होते हैं। इनमें से किसी एक पात्र की कल्पना करे। हे देवि ! अब कुल- द्रव्य का वर्णन करूँगा, ध्यान से सुनो। पानस, द्राक्ष, आध्वीक, खाजूर, ताल, ऐक्षव, मधु, उच्छिष्ट, माध्वीक, मैरेय और नारिकेल—ये ग्यारह मद्य भुक्ति व मुक्ति की देनेवाले हैं। बारहवाँ सुरा है, जो सबसे उत्तम है। सुरा तीन प्रकार की है—पैष्टी, गौड़ी और माध्वी। पैष्टी सब सिद्धियों की देनेवाली, गौड़ी भोगप्रदा और माध्वी सुरा मुक्ति-