भारतकोश
संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण

Kurma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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॥ श्रीहरिः ॥ ॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

कूर्मपुराण

[ पूर्वविभाग ]

पहला अध्याय

सूतजीकी उत्पत्ति, उनके रोमहर्षण नाम पड़नेका कारण, पुराणों तथा उपपुराणोंका नाम-परिगणन, समुद्र-मन्थनसे उत्पन्न विष्णुमायाका वर्णन, इन्द्रद्युम्नका आख्यान और कूर्मपुराणकी महिमा

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।<br>देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥(बदरिकाश्रममें निवास करनेवाले ऋषि) नारायण, नरोंमें उत्तम श्रीनर तथा उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वतीको नमस्कार कर जय (पुराण एवं इतिहास आदि सद्ग्रन्थों)-का पाठ करना चाहिये।
नमस्कृत्याप्रमेयाय विष्णवे कूर्मरूपिणे।<br>पुराणं सम्प्रवक्ष्यामि यदुक्तं विश्वयोनिना॥ १ ॥कूर्मरूप धारण करनेवाले अप्रमेय भगवान् विष्णुको नमस्कार कर मैं उस पुराण (कूर्मपुराण)-को कहूँगा, जो समस्त विश्वके मूल कारण भगवान् विष्णुके द्वारा कहा गया था॥ १॥
सत्रान्ते सूतमनघं नैमिषीया महर्षयः।<br>पुराणसंहितां पुण्यां पप्रच्छू रोमहर्षणम्॥ २ ॥<br><br>त्वया सूत महाबुद्धे भगवान् ब्रह्मवित्तमः।<br>इतिहासपुराणार्थं व्यासः सम्यगुपासितः॥ ३ ॥<br><br>तस्य ते सर्वरोमाणि वचसा हृषितानि यत्।<br>द्वैपायनस्य भगवांस्ततो वै रोमहर्षणः॥ ४॥नैमिषारण्यवासी महर्षियोंने (बारह वर्षतक चलनेवाले) सत्र (यज्ञ)-के पूर्ण हो जानेपर सर्वथा निष्पाप रोमहर्षण सूतजीसे पवित्र पुराण-संहिताके विषयमें प्रश्न किया—<br>महाबुद्धिमान् सूतजी महाराज! आपने इतिहास और पुराणोंके ज्ञानके लिये ब्रह्मज्ञानियोंमें परम श्रेष्ठ भगवान् वेदव्यासजीकी भलीभाँति उपासना की है। चूँकि आपके वचनसे द्वैपायन भगवान् वेदव्यासजीके समस्त रोम हर्षित हो गये थे, इसलिये आप 'रोमहर्षण' कहलाते हैं॥ २—४॥