संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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१२ | * कूर्मपुराण *
| भवन्तमेव भगवान् व्याजहार स्वयं प्रभुः।<br>मुनीनां संहितां वक्तुं व्यासः पौराणिकीं पुरा ॥ ५ ॥<br><br>त्वं हि स्वायम्भुवे यज्ञे सुत्याहे वितते हरिः।<br>सम्भूतः संहितां वक्तुं स्वांशेन पुरुषोत्तमः ॥ ६ ॥<br><br>तस्माद् भवन्तं पृच्छामः पुराणं कौर्ममुत्तमम्।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं पुराणार्थविशारद ॥ ७ ॥ | प्राचीन कालमें स्वयं समर्थ होते हुए भी भगवान् वेदव्यासजीने आपसे ही कहा था कि आप मुनियोंको पुराण-संहिता सुनायें। (सूतजी महाराज!) आप अपने अंशसे उत्पन्न साक्षात् पुरुषोत्तम नारायण हैं। स्वयम्भू ब्रह्माजीके महान् यज्ञमें सोमरस प्रस्तुत करनेके दिन पुराण-संहिताका वाचन करनेके लिये ही आपका आविर्भाव हुआ था। आप पुराणोंके अर्थको ठीक-ठीक जाननेवाले हैं। इसीलिये हम आपसे श्रेष्ठ कूर्मपुराणके विषयमें पूछ रहे हैं। आप हमें वह (कूर्मपुराण) बतायें ॥ ५-७ ॥ |
| मुनीनां वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः।<br>प्रणम्य मनसा प्राह गुरुं सत्यवतीसुतम् ॥ ८ ॥ | मुनियोंके वचन सुनकर पौराणिकोंमें श्रेष्ठ सूतजीने देवी सत्यवतीके पुत्र अपने गुरु (भगवान् वेदव्यास)-को मन-ही-मन प्रणाम कर (इस प्रकार) कहा— ॥ ८ ॥ |
| रोमहर्षण उवाच<br>नमस्कृत्य जगद्योनिं कूर्मरूपधरं हरिम्।<br>वक्ष्ये पौराणिकीं दिव्यां कथां पापप्रणाशिनीम्॥ ९ ॥<br><br>यां श्रुत्वा पापकर्मापि गच्छेत् परमां गतिम्।<br>न नास्तिके कथां पुण्यामिमां ब्रूयात् कदाचन ॥ १० ॥<br><br>श्रद्दधानाय शान्ताय धार्मिकाय द्विजातये।<br>इमां कथामनुब्रूयात् साक्षान्नारायणेरिताम्॥ ११ ॥ | रोमहर्षण सूतजी बोले—समस्त विश्वके मूल कारण, कूर्मरूप धारण करनेवाले भगवान् नारायण विष्णुको नमस्कार करके कूर्मपुराणकी उस दिव्य कथाको कहता हूँ, जो समस्त पापोंको नष्ट करनेवाली है और जिसे सुनकर महान्-से-महान् पाप करनेवाला पापी व्यक्ति भी परम गतिको प्राप्त कर लेता है। कूर्मपुराणकी इस पुण्यकथाको नास्तिक व्यक्तिको कभी भी नहीं सुनाना चाहिये। जो अत्यन्त श्रद्धालु हैं, शान्त हैं, धर्मात्मा हैं—ऐसे द्विजातियोंको साक्षात् नारायण भगवान् विष्णुके द्वारा कही गयी इस कूर्मपुराणकी कथाको विशेष रूपसे कहना चाहिये ॥ ९—११ ॥ |
| सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च।<br>वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥ १२ ॥ | सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग (प्रलय), वंश, वंशानुचरित तथा मन्वन्तर—ये पुराणोंके पाँच लक्षण हैं ॥ १२ ॥ |
| ब्राह्मं पुराणं प्रथमं पाद्मं वैष्णवमेव च।<br>शैव भागवतं चैव भविष्यं नारदीयकम् ॥ १३ ॥<br>मार्कण्डेयमथाग्नेयं ब्रह्मवैवर्तमेव च।<br>लैङ्गं तथा च वाराहं स्कान्दं वामनमेव च ॥ १४ ॥<br>कौर्मं मात्स्यं गारुडं च वायवीयमनन्तरम्।<br>अष्टादशं समुद्दिष्टं ब्रह्माण्डमिति संज्ञितम् ॥ १५ ॥ | अठारह महापुराणोंमें प्रथम पुराण ब्रह्मपुराण है, द्वितीय पद्मपुराण है। इसी प्रकार क्रमशः विष्णु, शिव, भागवत, भविष्य, नारद, मार्कण्डेय, अग्नि, ब्रह्मवैवर्त, लिङ्ग, वराह, स्कन्द, वामन, कूर्म, मत्स्य और गरुडपुराण हैं। भगवान् वायुके द्वारा कहा गया अठारहवाँ पुराण ब्रह्माण्डपुराणके नामसे कहा जाता है ॥ १३—१५ ॥ |
| अन्यान्युपपुराणानि मुनिभिः कथितानि तु।<br>अष्टादशपुराणानि श्रुत्वा संक्षेपतो द्विजाः ॥ १६ ॥ | (सूतजीने पुनः कहा—) ब्राह्मणो! अठारह पुराणोंका नाम सुनकर (अब आप लोग) मुनियोंद्वारा कहे गये अन्य उपपुराणोंका नाम भी संक्षेपमें सुनें— ॥ १६ ॥ |
| आद्यं सनत्कुमारोक्तं नारसिंहमतः परम्।<br>तृतीयं स्कान्दमुद्दिष्टं कुमारेण तु भाषितम् ॥ १७ ॥ | (इन उपपुराणोंमें) पहला उपपुराण सनत्कुमारके द्वारा कहा गया सनत्कुमार उपपुराण है। तदनन्तर दूसरा नरसिंहपुराण है। स्कन्दकुमारके द्वारा कथित तीसरा पुराण स्कन्दपुराण कहा गया है ॥ १७ ॥ |