संक्षिप्त कूर्मपुराण

संक्षिप्त कूर्मपुराण
Kurma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished506 पृष्ठ
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| अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या | अध्याय | विषय | पृष्ठ-संख्या |
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| जयध्वजको विष्णुका दर्शन ................. | १४१ | पुत्रकी प्राप्ति, कंसादिका वध, भृगु आदि महर्षियोंका द्वारकामें आना, भृगु आदि मुनियोंसे श्रीकृष्णद्वारा स्वधामगमनकी बात बताना, शिवसे द्वेष करनेवालोंको नरककी प्राप्तिका वर्णन तथा शिवकी महिमा बताना, नारायणका अपने कुलका संहारकर स्वधामगमन तथा वंश-वर्णनका उपसंहार........................ | १७२ | ||
| २२- | जयध्वजके वंश-वर्णनमें राजा दुर्जयका आख्यान, महामुनि कण्वद्वारा दुर्जयको वाराणसीके विश्वेश्वर-लिंगका माहात्म्य बतलाना, दुर्जयका वाराणसी जाकर पाप-मुक्त होना तथा सहस्रजित्-वंशका वर्णन. | १४७ | २७- | व्यासदेवद्वारा अर्जुनको सत्ययुगादि चारों युगोंके धर्मोंका उपदेश, व्यासद्वारा एक वेद-संहिताका चतुर्धा विभाजन, चारों युगोंमें चतुष्पाद धर्मकी विभिन्न स्थितिका निदर्शन तथा कलियुगमें धर्मके ह्रासका प्रतिपादन ................. | १७४ |
| २३- | यदुवंश-वर्णनमें क्रोष्टुवंशी राजाओंका वृत्तान्त, राजा नवरथकी कथा, सात्त्वतवंश-वर्णनमें अक्रूरकी उत्पत्ति, राजा आनकदुन्दुभिका आख्यान, कंस एवं वसुदेव-देवकीकी उत्पत्ति, वसुदेवका वंश-वर्णन, देवकीके अन्य पुत्रोंकी उत्पत्ति, रोहिणीसे संकर्षण-बलराम तथा देवकीसे श्रीकृष्णका आविर्भाव, वासुदेव कृष्णका वंश-वर्णन .................. | १५० | २८- | कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें शिवपूजनकी विशेष महिमाका ख्यापन, व्यासकृत शिवस्तुति, व्यासप्रेरित अर्जुनका शिवपुरीमें जाना और व्यासद्वारा शिवभक्त अर्जुनकी महिमा ................................ | १७८ |
| २४- | पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्या करने-हेतु भगवान् श्रीकृष्णका महामुनि उपमन्युके आश्रममें जाना, महामुनि उपमन्युद्वारा उन्हें पाशुपत-योग प्रदान करना, तपस्यामें निरत कृष्णको शिव-पार्वतीका दर्शन और श्रीकृष्णद्वारा उनकी स्तुति करना, शिवद्वारा पुत्रप्राप्तिका वर देना तथा माता पार्वतीद्वारा अनेक वर देना और शिवके साथ श्रीकृष्णका कैलास-गमन ................................... | १५६ | २९- | व्यासजीका वाराणसी-गमन, व्याससे जैमिनि आदि ऋषियोंका धर्मसम्बन्धी प्रश्न, व्यासका उन्हें शिव-पार्वती-संवाद बताना, अविमुक्तक्षेत्र वाराणसीका माहात्म्य, वाराणसी-सेवनका विशेष फल ................................... | १८४ |
| २५- | श्रीकृष्णका कैलास पर्वतपर विहार करना, श्रीकृष्णको द्वारका बुलानेके लिये गरुडका कैलासपर जाना, श्रीकृष्णका द्वारका-आगमन, द्वारकामें श्रीकृष्णका स्वागत तथा उनका दर्शन करनेके लिये देवताओं तथा मार्कण्डेय आदि मुनियोंका आना, कृष्णके द्वारा महर्षि मार्कण्डेयको शिव-तत्त्व तथा लिङ्ग-तत्त्वका माहात्म्य बतलाना तथा स्वयं शिवका पूजन करना, ब्रह्मा-विष्णुद्वारा शिवके महालिङ्गका दर्शन तथा लिङ्गस्तुति, लिङ्गार्चनका प्रवर्तन......................... | १६४ | ३०- | वाराणसीके ओंकारेश्वर और कृत्तिवासेश्वर लिङ्गोंका माहात्म्य, शंकरके कृत्तिवासा नाम पड़नेका वृत्तान्त ............................. | १९० |
| २६- | श्रीकृष्णको महेश्वरकी कृपासे साम्ब नामक | ३१- | वाराणसीके कपर्दीश्वर लिङ्गका माहात्म्य, पिशाचमोचन-कुण्डमें स्नान करनेकी महिमा, वहाँ स्नान करनेसे पिशाचयोनिसे मुक्ति प्राप्त करनेका आख्यान, शंकुकर्णकी कथा तथा शंकुकर्णकृत ब्रह्मपार-स्तव ........... | १९२ | |
| ३२- | व्यासजीद्वारा वाराणसीके मध्यमेश्वर महादेव तथा मन्दाकिनीकी महिमाका वर्णन....... | १९७ | |||
| ३३- | वाराणसी-माहात्म्यके प्रसंगमें व्यासजीका शिष्योंके साथ विभिन्न तीर्थोंमें गमन, ब्रह्मतीर्थका आख्यान, व्यासजीद्वारा विश्वेश्वर |