लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा
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Read in context( ११४ ) लीलावती । दिया तब लब्धि हुए १०७३७४१८२३ फिर इनको आदि धन दो २ से गुणा किया तब हुए २१४७४८३६४६ इन वराटकोंके निष्क किये तब हुए १०४८५७ द्रम्म ९ पण ९ काकिणी २ कौडी ६ ॥ उदाहरणम्- दूसरा उदाहरण- आदिर्द्विकं सखे वृद्धिः प्रत्यहं त्रिगुणोत्तरा ॥ गच्छः सप्तदिनं यत्र गणितं तत्र किं वद् ॥ २ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यत्र आदिः द्विकम् प्रत्यहं त्रिगुणोत्तरा वृद्धिः गच्छः सप्तदिनं तत्र गणितं किं भवति ? इति वद् ॥ २ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जहाँ आदिधन २ दो है और प्रतिदिन वृद्धि ( चय ) त्रिगुणी है और गच्छ सात ७ दिन हैं, तहाँ क्या श्रेढीफल होगा ? सो कहो ॥ २ ॥ न्यासः-आ० २ चयः ३ ग० ७ लब्धं गणितम् २१८६ फैलाव-इस उदाहरण में आदि धन दो २ है चय३ तीन है गच्छ ७ सात है केवल सर्वधन नहीं जानते हैं उसके जानने के वास्ते ऊपर कही हुई रीति के अनुसार गच्छ सात ७ विषम है इस कारण एक १ घटा दिया और गुण लिखा फिर शेष ६ सम है इसके आधे किये और वर्ग लिखा फिर ३ विषम है इस कारण एक घटा दिया और गुण-३ गु० .... २१८७ गुण लिखा, फिर शेष २ सम है आधा किया वर्ग-वर्ग .... ७२९ और वर्ग लिखा फिर १ एक विषम बचा एक गुण-३ गु० .... ....२७ घटा दिया और गुण लिखा तब कुछ शेष नहीं वर्ग-वर्ग .... .... ९ रहा फिर इस प्रकार जो गुणवर्गकी पंक्ति मिली गुण-गुण .... .... ३ उसमें नीचेकी तरफ पहले गुण है तहाँ चय ३ तीनको लिखा फिर उसके ऊपर वर्ग लिखा है इस कारण ३ तीनका वर्ग करके ९ उसके ऊपर लिखा फिर उसके ऊपर ३ गुण लिखा है इस कारण ९ नौको ३ तीनसे गुणा करके २७ उसके ऊपर लिखा फिर उसके ऊपर वर्ग लिखा है इस कारण २७ का वर्ग करके ७२९उसके ऊपर लिखा फिर उसके ऊपर गुण लिखा है, इस कारण ७२९ को ३ तीनसे गुणा करके २१८७ उसके ऊपर लिखा फिर अन्त आगया, इस कारण इसमें एक १ हीन किया तब शेष रहे २१८६ इसमें एक करके हीन गुण २ का भागलिया और आदिधन २ से गुणा किया तब लब्धि मिले २१८६यही सर्वधन हुआ। समादिवृत्तज्ञानाय वरणसूत्रं सार्द्धार्या ॥