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लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)

Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary

by भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा

DevanagariSanskritpublished268 pages
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( ११४ ) लीलावती । दिया तब लब्धि हुए १०७३७४१८२३ फिर इनको आदि धन दो २ से गुणा किया तब हुए २१४७४८३६४६ इन वराटकोंके निष्क किये तब हुए १०४८५७ द्रम्म ९ पण ९ काकिणी २ कौडी ६ ॥ उदाहरणम्- दूसरा उदाहरण- आदिर्द्विकं सखे वृद्धिः प्रत्यहं त्रिगुणोत्तरा ॥ गच्छः सप्तदिनं यत्र गणितं तत्र किं वद् ॥ २ ॥ अन्वयः-हे सखे ! यत्र आदिः द्विकम् प्रत्यहं त्रिगुणोत्तरा वृद्धिः गच्छः सप्तदिनं तत्र गणितं किं भवति ? इति वद् ॥ २ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जहाँ आदिधन २ दो है और प्रतिदिन वृद्धि ( चय ) त्रिगुणी है और गच्छ सात ७ दिन हैं, तहाँ क्या श्रेढीफल होगा ? सो कहो ॥ २ ॥ न्यासः-आ० २ चयः ३ ग० ७ लब्धं गणितम् २१८६ फैलाव-इस उदाहरण में आदि धन दो २ है चय३ तीन है गच्छ ७ सात है केवल सर्वधन नहीं जानते हैं उसके जानने के वास्ते ऊपर कही हुई रीति के अनुसार गच्छ सात ७ विषम है इस कारण एक १ घटा दिया और गुण लिखा फिर शेष ६ सम है इसके आधे किये और वर्ग लिखा फिर ३ विषम है इस कारण एक घटा दिया और गुण-३ गु० .... २१८७ गुण लिखा, फिर शेष २ सम है आधा किया वर्ग-वर्ग .... ७२९ और वर्ग लिखा फिर १ एक विषम बचा एक गुण-३ गु० .... ....२७ घटा दिया और गुण लिखा तब कुछ शेष नहीं वर्ग-वर्ग .... .... ९ रहा फिर इस प्रकार जो गुणवर्गकी पंक्ति मिली गुण-गुण .... .... ३ उसमें नीचेकी तरफ पहले गुण है तहाँ चय ३ तीनको लिखा फिर उसके ऊपर वर्ग लिखा है इस कारण ३ तीनका वर्ग करके ९ उसके ऊपर लिखा फिर उसके ऊपर ३ गुण लिखा है इस कारण ९ नौको ३ तीनसे गुणा करके २७ उसके ऊपर लिखा फिर उसके ऊपर वर्ग लिखा है इस कारण २७ का वर्ग करके ७२९उसके ऊपर लिखा फिर उसके ऊपर गुण लिखा है, इस कारण ७२९ को ३ तीनसे गुणा करके २१८७ उसके ऊपर लिखा फिर अन्त आगया, इस कारण इसमें एक १ हीन किया तब शेष रहे २१८६ इसमें एक करके हीन गुण २ का भागलिया और आदिधन २ से गुणा किया तब लब्धि मिले २१८६यही सर्वधन हुआ। समादिवृत्तज्ञानाय वरणसूत्रं सार्द्धार्या ॥

३. श्रेणी-व्यवहार, क्षेत्र-व्यवहार व समतल ज्यामिति

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श्रेढीव्यवहारः । ( ११५ ) सम अर्द्धसम विषम इत्यादि छन्दोंके भेद जाननेकी रीति डेढ श्लोक आर्याछन्दमें लिखते हैं- पादाक्षरमितगच्छे गुणवर्गफलञ्चये द्विगुणे ॥ ३९ ॥ समवृत्तानां संख्या तद्वर्गो वर्गवर्गश्च ॥ स्वस्वपदानौ स्यातामर्द्धसमानाञ्च विषमाणाम् ॥ ४० ॥ अन्वयः-पादाक्षरमितगच्छे चये द्विगुणे यत् गुणवर्गफलं सा समवृत्तानां संख्या भवति । तद्वर्गः वर्गवर्गः च पृथक् स्वस्वपदोनौ अर्द्धसमानां विषमाणां च संख्ये स्याताम् ॥ ४० ॥ अर्थः-पादके जितने अक्षर हों उसको गच्छ माने और चयको दूना करै तब ऊपर कही हुई गुणवर्गकी रीतिके अनुसार जो फल आवेगा सो समवृत्तोंकी संख्या होगी और उस फलका वर्ग करके समवृत्तकी संख्या घटाकर जो शेष रहेगा सो अर्द्ध सम वृत्तोंकी संख्या होगी और पहला जो वर्गफल है, उसका वर्ग करके पहला वर्गफल घटा देनेसे जो शेष रहेगा सो विषमवृत्तोंकी संख्या होगी ॥ ४० ॥ उदाहरणम्- समानामर्द्धतुल्यानां विषमाणां पृथक्पृथक् ॥ वृत्तानां वद मे संख्यामनुष्टुप्छन्दसि द्रुतम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! अनुष्टुप्छन्दसि समानाम् अर्द्धतुल्यानां विषमाणां च वृत्तानां संख्याम् मे पृथक् पृथक् द्रुतम् वद ॥ १ ॥ अर्थः-हे मित्र ! अनुष्टुप् छन्दसे सम, अर्द्धसम और विषम, वृत्तोंकी भी संख्या मुझसे अलग अलग शीघ्र कहो ॥ १ ॥ न्यासः-उत्तरो गुणः २ । गच्छः ८ । लब्धाः समवृत्तानां संख्याः २५६ । तथाऽर्द्धसमानाम् ६५२८० । विषमाणाञ्च ४२९४९०१७६० । फैलाव-इस उदाहरणमें अनुष्टुप् छन्दके विषयका प्रश्न है इस कारण अनुष्टुप् छन्दके पादक अक्षर ८ आठको गच्छ माना और चय २ को दूना किया फिर गुणव- र्गकी रीति करी; अर्थात् यहां आदि चय २ दो है;इस कारण सम अंक होनेसे आधा करके वर्ग स्थापन किया, फिर शेष १ एक विषम हैं; इस कारण १ घटा दिया और गुण स्थापन किया; अब यहाँ पहिले नीचेकी तरफ वर्ग लिखा है; इस कारण गच्छ

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(११६) लीलावती । ८ आठका वर्ग किया तब ६४ चौंसठ हुआ; फिर गुण लिखा है; इस कारण द्विगु- णित चय ४ से वर्ग किये हुए चौंसठ ६४ को गुणा किया तब २५६ दोसौ छप्पन हुए. यही समवृत्तोंकी संख्या हुई. फिर २५६ इसका वर्ग किया तब ६५५३६ इतने हुए; इसमें अपने मूल २५६ को घटा दिया तब ६५२८० यह अर्द्ध समवृत्तोंकी संख्या हुई. फिर पहले वर्गफल ६५५३६ का वर्ग किया तब ४२९४९६७२९६ इतने हुए, इसमें अपना मूल घटा दिया तब ४२९४९०१७६० यह शेष रहे. यही विषमवृत्तोंकी संख्या हुई ॥ समवृत्त उसको कहते हैं, जिसके चारों चरणके वर्ण समान हों. अर्द्धसम उसको कहते हैं, जिसके प्रथम, तृतीय चरण एक जातिके हों और द्वितीय, चतुर्थ चरण एक जातिके हों ॥ विषम उसको कहते हैं, जिसके चारों चरण भिन्न भिन्न हों । इति लीलावत्यां श्रेढीव्यवहारः । इति प्रथमः खण्डः।

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क्षेत्रव्यवहारः। (११७) अथ द्वितीयखण्डः। तत्रादौ क्षेत्रव्यवहारः। पहले क्षेत्रव्यवहार कहते हैं- तत्र भुज कोटिकर्णानामन्यतमाभ्यामन्यतमानय- नाय करणसूत्रं वृत्तद्वयम्- तहाँ क्षेत्रव्यवहारमें भुज, कोटि, कर्ण यह तीन विभाग होते हैं, उनमेंसे दोको जानकर तीसरेको जाननेकी रीति दो श्लोकमें लिखते हैं- इष्टो बाहुर्यः स्यात्तत्स्पर्द्धिन्यां दिशीतरो बाहुः ॥ त्र्यस्रे चतुरस्रे वा सा कोटिः कीर्त्तिता तज्ज्ञैः ॥ १ ॥ तत्कृत्योर्योगपदं कर्णो दोः कर्णवर्गयोर्विवरात् ॥ मूलं कोटिः कोटिश्रुतिकृत्योरन्तरात्पदं बाहुः ॥ २ ॥ अन्वयः-त्र्यस्रे चतुरस्रे वा यः इष्टः बाहुः तत्स्पर्द्धिन्यां दिशि यः इतरः बाहुः सा तज्ज्ञैः कोटिः प्रकीर्त्तिता ॥ १ ॥ तत्कृत्योः योगपदं कर्णः स्यात् । दोः कर्णवर्गयोः विवरात् मूलं कोटिः स्यात् कोटिश्रुतिकृत्योः अन्तरात् पदम् बाहुः स्यात् ॥ २ ॥ अर्थः-त्रिभुज अथवा चतुर्भुज क्षेत्रमें जो माना हुआ भुज है, उसको रोकने- वाली जो दूसरी बाहु है उसको गणितशास्त्रके जाननेवाले कोटि कहते हैं. (कोटि और भुजके अग्रभागोंको बाँधनेवाली जो रेखा है उसको कर्ण कहते हैं) भुज और कोटिके वर्गका योगकर वर्गमूल लेनेसे जो लब्धि हो वह जात्यत्रिभुजमें कर्णका प्रमाण होता है. भुज और कर्णका वर्ग कर अन्तर करनेसे जो शेष रहे; उसका मूल लेनेसे जो लब्धि हो वह कोटिका प्रमाण होता है; कोटि और कर्णका वर्ग कर अन्तर करनेसे जो शेष रहे उसका मूल लेनेसे जो लब्धि हो वह भुजका प्रमाण होता है ॥ २ ॥ उदाहरणम्- कोटिश्चतुष्टयं यत्र दोस्त्रयं तत्र का श्रुतिः ॥ कोटिं दोः कर्णतः कोटिश्रुतिभ्याञ्च भुजं वद॥ १ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

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( ११८ ) लीलावती । अन्वयः-यत्र चतुष्टयं कोटिः त्रयं दोः तत्र श्रुतिः का ? दोः कर्णतः कोटिं वद कोटिश्रुतिभ्याम् भुजं च वद ॥ १ ॥ अर्थः-जहाँ ४ चार कोटिका प्रमाण है तीन ३ भुजका प्रमाण है तहाँ कर्णका क्या प्रमाण होगा ? और भुज कर्ण जानकर कोटिका क्या प्रमाण होगा और कोटि कर्ण जानकर भुजका क्या प्रमाण होगा ? सो कहो ॥ १ ॥ न्यासः- कोटिः ४ भुजः ३ भुजवर्गः ९ कोटिवर्गः १६ एतयोर्योगात् २५ मूलम् ५ कर्णो जातः ॥ अथ कर्णभुजाभ्यां कोट्यानयनम्- कर्णः ५ भुजः ३ अनयोर्वर्गांतरम् १६ एतन्मूलं कोटिः ४ अथ कोटिकर्णाभ्यां भुजानयनम्- कोटिः ४ कर्णः ५ अनयोर्वर्गांतरम् ९ एतन्मूलं भुजः ३ फैलाव-यहां नीचेकी आडी रेखा मानी हुई भुज है और उसको रोकती हुई जो सीधी रेखा है, वह कोटि है. और दोनों रेखाओंको बाँधने- वाली जो तिरछी रेखा है सो कर्ण है. अब यहां भुजप्रमाण ३ तीन और कोटिप्रमाण ४ चार तो जानते हैं परन्तु यह नहीं जानते हैं कि कर्णका क्या प्रमाण है इस कारण ऊपर कहे हुए सूत्रके अनुसार भुज ३ तीनका वर्ग किया तब ९ हुआ; और कोटि ४ चारका वर्ग किया तब १६ हुआ इनका योग किया तब २५ पचीस हुए; इसका मूल लिया तब ५ पाँच लब्ध हुआ. यही इस क्षेत्रमें कर्णका प्रमाण है ॥

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क्षेत्रव्यवहारः । (११९) अब कर्णभुज जानकर कोटि जाननेका उदाहरण- इस उदाहरणमें कर्णप्रमाण ५ और भुजप्रमाण ३ तीन जानते हैं परन्तु कोटिका प्रमाण नहीं जानते; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार कर्ण ५ पांचका वर्ग किया तो २५ हुए और भुज ३ तीनका वर्ग किया तब ९ हुए. इनका अन्तर किया तब १६ शेष रहे इनका मूल लनेसे ४ चार लब्धि हुए यही कोटिकी प्रमाण है. अब कोटि और कर्ण जानकर भुज लानेका उदाहरण- इस उदाहरणमें कोटिप्रमाण ४ और कर्णप्रमाण ५ पांच जानते हैं, परन्तु भुजका प्रमाण नहीं जानते इस कारण ऊपरकी रीतिके अनुसार कोटि ४ का वर्ग किया तब १६ हुए और कर्ण ५ पांचका वर्ग किया तब २५ हुए; इनका अन्तर किया तब ९ नौ शेष रहे इनका मूल लिया तब तीन लब्धि हुए. यही भुजका प्रमाण है ॥ प्रकारान्तरेण तज्ज्ञानाय करणसूत्रं सार्द्धं वृत्तम्- भुज, कोटि, कर्ण जाननेकी और रीति कहते हैं डेढ श्लोकमें- राश्योरन्तरवर्गेण द्विघ्ने घाते युते तयोः ॥ वर्गयोगो भवेदेवं तयोर्योगान्तराहतिः ॥ ३ ॥ वर्गान्तरं भवेदेवं ज्ञेयं सर्वत्र धीमता ॥ अन्वयः-ययोः राश्योः वर्गयोगः कार्य्यः तयोः द्विघ्ने घाते अन्तरवर्गेण युते सति वर्गयोगः भवेत् । एवं तयोः योगान्तराहतिः कार्य्या तदा वर्गान्तरम् भवेत् धीमत सर्वत्र एवं ज्ञेयम् ॥ ३ ॥ अर्थः-जिन राशियोंका वर्गयोग करना हो उनका परस्पर घात कर ले फिर दो २ से गुणा कर ले और उन्हीं राशियोंके अन्तरका वर्ग जोडनेपर जो राशि सिद्ध हो वही उन राशियोंके वर्गोंका योग होगा. इसी प्रकार जिन राशियोंका वर्गान्तर करना हो उनका योग कर ले और उन्हीं राशियोंके अन्तरसे गुणा कर दे तब वर्गान्तर हो जाता है बुद्धिमान् सब जगह ऐसा ही जाने ॥ ३ ॥

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( १२० ) लीलावती । कोटिश्चतुष्टयमिति पूर्वोक्तोदाहरणे-- इसका ( कोटिश्चतुष्टयमित्यादि ) पहला ही उदाहरण है। न्यासः-कोटिः ४। भुजः ३। अनयोर्घाते १२ द्विघ्ने २४ अन्तर्वर्गेण १ युते वर्गयोगः २५ अस्य मूलम् कर्णः ५। अथ कर्णभुजाभ्यां कोट्यानयनम्- कर्णः ५ भुजः ३ अनयोर्योगः ८ पुनरे- तयोरन्तरेण २ हतो वर्गान्तरम् १६ अस्य मूलम् ४ कोटिः अथ भुजज्ञानम्- कोटिः ४ कर्णः ५ एवं जातो भुजः ३ फैलाव-इस उदाहरणमें भुज और कोटि जानते हैं परन्तु कर्णका प्रमाण नहीं जानते; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार ४। ३ इन दोनों राशियोंका घात किया तब बारह हुए; इनको २ से गुणा किया तब २४ हुए, इसमें उन ही ४ । ३ दोनों राशि योंके अन्तर १ का वर्ग जोड दिया तब २५ हुए; यह भुजको टिके वर्गका योग हुआ पहली रीतिके अनुसार इसका मूल लिया तब पांच लब्धि हुआ, यही कर्णका प्रमाण है ॥ अब कर्ण और भुज जानकर कोटि लानेका उदाहरण लिखते हैं- ऊपर कही हुई वर्गान्तरकी सरल रीतिके अनुसार भुज ३ तीन कर्ण ५ पांचका योग किया तब ८ हुए; इसमें उन ही ३ । ५ दोनों राशियोंके अन्तर २ से गुणा किया तब १६ हुए; इनका पहली रीतिके अनुसार मूल लिया तब चार ४ लब्धि हुए. यही कोटिका प्रमाण है ॥ अब कर्णकोटि जानकर भुज लानेका उदाहरण दिखाते हैं-

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क्षेत्रव्यवहारः । ( १२१ ) यहां भी ऊपर कही हुई वर्गान्तरकी सरल रीतिके अनुसार ४ । ५ दोनों राशियोंका योग किया तब ९ नौ हुए; इसको उन ही ४।५ दोनों राशियोंके अन्तर १ से गुणा किया तब ९ हुए; इसका पहली रीतिके अनुसार मूल लिया तब ३ तीन लब्धि हुए. यही भुजका प्रमाण है ॥ उदाहरणम्-- दूसरा उदाहरण- सांघ्रित्रयमितो बाहुर्यत्र कोटिश्च तावती ॥ तत्र कर्णप्रमाणं किं गणक ब्रूहि मे द्रुतम् ॥ २ ॥ अन्वयः-हे गणक ! यत्र बाहुः सांघ्रित्रयमितः तावती च कोटिः तत्र कर्ण- प्रमाणं किम् इति मे द्रुतम् ब्रूहि ? ॥ २ ॥ अर्थः-हे गणक ! जहां भुजप्रमाण तो ३ १/४ सबातीन है और कोटि भी उतनी नहीं ३ १/४ है; तहाँ कर्णका क्या प्रमाण होगा ? यह मुझको शीघ्र कहो ॥ २ ॥ न्यासः-भुजः १३/४ कोटिः १३/४ अनयोर्वर्गयोगः १६९/८ अस्य मूलाभावात्करणीगत एवायं कर्णः । अस्यासन्नमूलज्ञानार्थमुपायः ॥ फैलाव-यहां भुज १३/४ का वर्ग योग ३३८/१६ हुआ. इसमें दोका अपवर्तन दिया तब १६९/८ ऐसा रूप हुआ; अब पहली रीतिके अनुसार इसका मूल लेना चाहिये, परन्तु यहाँ मूल नहीं मिलता; इस कारण यह करणीगत मूल कहाता है. ऐसे स्थानमें ठीक मूल नहीं मिलता; परन्तु मूलके समीपका अङ्क मालूम हो सकता है. उसकी रीति लिखते हैं- वर्गेण महतेष्टेन हताच्छेदांशयोर्वधात् ॥ पदं गुणपदक्षुण्णच्छिद्रक्तं निकटं भवेत् ॥ ३ ॥ अन्वयः-महतेष्टेन वर्गेण हतात् छेदांशयोः वधात् यत् पदं तत् गुणपदक्षुण्ण- च्छिद्रक्तं निकटम् भवेत् ॥ ३ ॥

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( १२२ ) लीलावती । अर्थ:-किसी मूल देनेवाले बड़े इष्ट अंकसे गुणा किये हुए हर और अंशके घातका मूल ले इसमें इष्ट गुणकके मूलसे गुणा किये हुए हरका भाग दे; जो लब्धि हो वही मूलके अत्यन्त समीपका अंक होगा ॥ ३ ॥ न्यासः-अयं कर्णकरणी १६९/८ अस्य छेदांश- घातः १३५२ अयुतघ्नः १३५२०००० अस्यासन्नमूलम् ३६७७ इदं गुणमूलम् १०० गुणितच्छेदेन ८०० भक्तं लब्धमासन्नपदम् ४ ४७७/८०० अयं कर्णः। एवं सर्वत्र ॥ फैलाव-ऊपर कहे हुए उदाहरणमें १६९/८ यह कर्णकी करणी है इसके हर और अंशघात किया तब १३५२ हुए; इसको बड़े वर्गांक अर्थात् मूल देनेवाले अङ्क १०००० दश हजारसे गुणा किया तब १३५२०००० हुए; इसका मूल लिया तब ३६७७ मिला इसमें इष्टगुणक १०००० के मूल १०० से गुणा किये हुए हर ८०० का भाग लिया तब ४ ४७७/८०० लब्धि हुआ; यही मूलके अत्यन्त समीपका अंक है और यही कर्णका प्रमाण है. इसी प्रकार सब जगह जानना चाहिये ॥ त्र्यस्रजात्ये करणसूत्रं वृत्तद्वयम्-- दिये हुए भुज वा कोटिसे जात्यत्रिभुज बनानेकी रीति दो श्लोकोंमें लिखते हैं- इष्टो भुजोऽस्माद्दिगुणेष्टनिघ्नादिष्टस्य कृत्यैकवियुक्तयातम् ॥ कोटिः पृथक्सेष्टगुणा भुजोना कर्णो भवेत्त्र्यस्रमिदं तु जात्यम्॥४॥ अन्वयः-इष्टः कल्प्यः भुजः कल्प्यः द्विगुणेष्टनिघ्नात् अस्मात् एकवियुक्तया इष्टस्य कृत्या यत् आप्तं सा कोटिः स्यात् सा पृथक् इष्टगुणा भुजोना कर्णो भवेत् इदं त्र्यस्रं जात्यम् ॥ ४ ॥ अर्थः-१ इष्ट कल्पना करे और एक भुज कल्पना करे और इष्टको द्विगुणा करके जो अंक हो उससे कल्पना किये हुए भुजको गुणा कर दे जो अंक गुणनंसे हो उनमें इष्टके वर्गमें एक घटा कर जो अंक शेष रहे उसका भाग दे तब जो अंका लब्धि हो वही कोटि होगी और उसी कोटिको दूसरे स्थानमें लिखकर फिर कल्पना किये हुए इष्टसे गुणा कर दे और कल्पना की हुई भुज घटा दे तब जो अंक शेष रहे वही कर्ण होता है; इस प्रकार जात्यत्रिभुज बन जाता है. तरह तरह हके इष्ट कल्पना करनेसे अनेक प्रकारका जात्यत्रिभुज बन सकता है॥ ४ ॥

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क्षेत्रव्यवहारः । ( १२३ ) उदाहरणम्- भुजे द्वादशके यौ यौ कोटिकर्णावनेकधा ॥ प्रकाराभ्यां वद् क्षिप्रं तौ तावकरणीगतौ ॥ ५ ॥ अन्वयः-हे गणक ! द्वादशके भुजे यौ यौ कोटिकर्णौ भवतः अकरणीगतौ तौ तौ प्रकाराभ्यां क्षिप्रम् अनेकधा वद ॥ ५ ॥ अर्थः-हे गणक ! जिस क्षेत्रमें भुजका प्रमाण १२ बारह कल्पना किया है उस क्षेत्रके अनेक इष्टोंकी कल्पनासे जितने जितने प्रमाणवाले कोटि और कर्ण होंगे वह वह अकरणीगत कोटिकर्ण दोनों रीतियोंसे अर्थात् ऊपर कही हुई रीतिसे और आगेकी रीतिसे भी अनेक प्रकार हमसे शीघ्र कहो ॥ ५ ॥ न्यासः-इष्टो भुजः १२ इष्टम् २ अनेन द्विगुणेन ४ गुणितो भुजः ४८ इष्ट २ कृत्या ४ एकोनया ३ भक्तो लब्धा कोटिः १६ इयमिष्टगुणा ३२ भुजो १२ ना जातः कर्णः २० ॥ त्रिकेनेष्टेन वा कोटिः ९ कर्णः १५ इत्यादि । पञ्चकेन वा कोटिः ५ कर्णः १३ इत्यादि । फैलाव-यहाँ भुजका प्रमाण १२ कल्पना किया है और कोटि कर्णका प्रमाण नहीं जानते हैं; इस कारण ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार इष्ट कल्पना किया २ इसका द्विगुणा किया तब ४ चार हुए; इससे कल्पित भुज १२ का गुणा किया तब ४८ हुए; इसमें इष्टका वर्गकर ४ मेंसे एक घटाया तब ३ शेष रहे; इनका भाग दिया तब १६ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

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( १२४ ) लीलावती । सोलह लब्धि हुए; यही कोटिका प्रमाण है; इसी कोटिको इष्ट २ से गुणा किया तब ३२ हुए इसमें कल्पित भुज १२ को घटा दिया तब २० शेष रहे यही कर्णका प्रमाण है. जब ३ तीनको इष्ट माना तब इष्ट ३ को द्विगुणा ६ किया इससे माने हुए भुज १२ को गुणा किया तब ७२ हुए; इसमें इष्ट ३ का वर्ग कर १ एक घटाया तब ८ आठ शेष रहे; इनका भाग दिया तब ९ लब्धि हुए; यही कोटिका प्रमाण है; इसी कोटिको इष्ट ३से गुणा किया तब २७ हुए; इसमें भुज १२ का घटाया तब १५ शेष रहे. यही कर्णका प्रमाण है ॥ जब पांच ५ को इष्ट माना तब पूर्वोक्त रीतिके अनुसार क्रिया करनेसे कोटिका प्रमाण ५ और कर्णका प्रमाण १३ होता है. इस प्रकार जितने इष्ट मानोगे उतने ही अनेक प्रकारके कोटिकर्ण मिलेंगे ॥ अस्यैव द्वितीयः प्रकारः- इसीकी दूसरी रीति दिखाते हैं- इष्टो भुजस्तत्कृतिरिष्टभक्ता द्विःस्थापितेष्टोनयुतार्द्धिता वा ॥ तौ कोटिकर्णाविति कोटितो वा बाहुश्रुती चाकरणीगते स्तः॥६॥ अन्वयः-इष्टः कल्प्यः भुजः कल्प्यः इष्टभक्ता तत्कृतिः द्विःस्थापिता इष्टोनयुता ततः अर्द्धिता इति तौ कोटिकर्णौ स्तः। वा कोटितः अकरणीगते बाहुश्रुती च स्तः॥५॥ अर्थः-पहले एक इष्ट कल्पना करे और एक भुज कल्पना करे कल्पना किये हुए भुजके वर्गमें इष्टका भाग दे जो लब्धि हो, उसका दो स्थानमें लिखे; एक स्थानमें कल्पित इष्टको जोड दे; और एक स्थानमें घटा दे; फिर आधा कर ले; इस प्रकार कोटि और कर्ण होते हैं. यदि कोटिसे पूर्वोक्त किया करे तो भुज और कर्ण अकरणीगत सिद्ध होते हैं ॥ ५ ॥ उदाहरण पहला कहा हुआ ही जानना. अथ द्वितीयप्रकारेण न्यासः- इष्टो भुजः १२ अस्य कृतिः १४४ इष्टेन २ भक्ता लब्धम् ७२ इष्टेन २

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क्षेत्रव्यवहारः । ( १२६ ) ऊना ७० युता ७४ वर्द्धितो जातौ कोटिकर्णौ ३५ । ३७॥ चतुष्टयेन वा कोटिः १६ कर्णः २० षट्केन वा कोटिः ९ कर्णः १५ फैलाव-इष्ट कल्पना किया २ इष्टभुज कल्पना किया १२ कल्पित भुजका वर्ग किया तो हुए १४४ इसमें इष्ट २ का भाग लिया तो लब्धि हुए ७२ इसको दो स्थानमें लिखकर एक स्थानमें इष्टको घटा दिया तो हुए ७० दूसरे स्थानमें इष्ट जोड दिया तो हुए ७४ इन दोनों स्थानके अंकों ७० । ७४ को आधा किया तो ३५ । ३७ हुए; यही कोटि कर्णका प्रमाण है; अर्थात् कोटिका प्रमाण ३५ और कर्णका प्रमाण, सैंतीस ३७ हुआ तब क्षेत्रका आकार ऐसा हुआ है ॥ जब चार ४ को इष्ट माना तब ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार इष्ट भुज १२ का वर्ग किया तब १४४ हुए; इसमें इष्ट ४ का भाग दिया तब ३६ लब्धि हुए इनको दो स्थानमें लिखकर एक स्थानमें इष्ट ४ घटाया और एक स्थानमें जोडा तब ३२ । ४० हुए; इनको आधा किया तब १६ । २० हुए यही कोटिकर्णका प्रमाण है ॥ जब छ ६ को इष्ट माना तब भुज १२ बारहके वर्ग १४४ में इष्ट ६ का भाग दिया तब २४ लब्धि हुए इनको दो स्थानोंमें लिखकर एक स्थानमें इष्टको घटा दिया और एक स्थानमें जोड दिया तब १८ । ३० हुए; इनको आधा किया तब ९ । १५ हुए; यही कोटि और कर्णका प्रमाण है ॥

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( १२६ ) लीलावती । इसी रीतिसे कोटिका प्रमाण कल्पना करके अनेक प्रकारके भुज कर्ण; इष्टके अनेक प्रकार होनेसे हो सकते हैं ॥ अथेष्टकर्णात्कोटिभुजानयने करणसूत्रं वृत्तम्- कल्पित कर्णसे कोटि और भुज लानेकी रीति एक श्लोकमें- इष्टेन निघ्नाद्द्विगुणाच्च कर्णादिष्टस्य कृत्यैकयुजा यदाप्तम् ॥ कोटिर्भवेत्सा पृथगिष्टनिघ्नी तत्कर्णयोरन्तरमत्र बाहुः ॥ ६ ॥ अन्वयः-इष्टेन निघ्नात् द्विगुणात् कर्णात् एकयुजा इष्टस्य कृत्या यत् आप्तं सा कोटिः भवेत् । सा पृथक् इष्टनिघ्नी तत्कर्णयोः अन्तरम् बाहुः स्यात् ॥ ६ ॥ अर्थः-कर्णको दूना कर इष्टसे गुणा करे जो अंक हों उनमें एक युक्त इष्टके वर्गका भाग दे; जो लब्धि हो वही कोटि है उसी क्षेत्रमें कोटिको इष्टसे गुणा कर जो अंक हो उनका और कर्णका अन्तर करनेसे जो शेष रहे वही भुजका प्रमाण होता है ॥६॥ उदाहरणम्- पञ्चाशीतिमिते कर्णे यौ यावकरणीगतौ ॥ स्यातां कोटिभुजौ तौ तौ वद कोविद् सत्वरम् ॥ ४ ॥ अन्वयः-हे कोविद् ! पञ्चाशीतिमिते कर्णे यौ यौ कोटिभुजौ स्याताम् अकरणी गतौ तौ तौ सत्वरं वद ॥ ४ ॥ अर्थः- हे गणक ! जिस क्षेत्रमें ८५ पचासी कर्ण हैं; उस क्षेत्रमें कोटि और भुजकी जो जो संख्या हो वह वह अकरणीगत शीघ्र कहो ॥ ४ ॥ न्यासः-कर्णः८५ अयं द्विगुणः १७० द्विके- नेष्टेन हतः ३४० इष्ट २ कृत्या ४ सैकया ५ भक्ते जाता कोटिः ६८ इयमिष्टगुणा १३६ कर्णो ८५ निता जातो भुजः ॥ ५१ ॥ चतुष्केनेष्टेन वा । कोटिः४० भुजः ७५

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क्षेत्रव्यवहारः। (१२७) फैलाव-इस क्षेत्रमें कर्ण ८५ पचासी मालूम है; अब भुज और कोटि जाननेके वास्ते उपरोक्त नियमानुसार कर्ण ८५ को २ दोसे गुणा किया तब १७० हुए; इनको इष्ट २ दोसे गुणा किया तब ३४० हुए, इनमें इष्ट २ दोके वर्ग ४ में १ मिलाकर ५ का भाग दिया तब ६८ अडसठ लब्धि हुए; यही कोटिका प्रमाण है. अब कोटि ६८ को इष्ट २ से गुणा किया तब १३६ हुए इनमें कर्ण ८५ को घटाया तब ५१ शेष रहे; यही भुजका प्रमाण है. जब चार ४ को इष्ट माना तब कर्ण ८५ को दोसे गुणा करनेसे वही १७० हुए; इनको इष्ट ४ से गुणा किया तब ६८० हुए; इनमें एक युक्त इष्ट ४ के वर्ग १७ का भाग दिया तब ४० लब्धि हुए; यही कोटिका प्रमाण है फिर इसी कोटि ४० को इष्ट ४ से गुणा किया तो १६० हुए; इसमें कर्ण ८५ को घटाया तब ७५ शेष रहे; यही भुजका प्रमाण है; इस प्रकार जैसा इष्ट कल्पना किया जायगा वैसा ही क्षेत्रका आकार बदल जायगा इस कारण इस भेदसे क्षेत्र भी अनेक प्रकारका होगा॥ पुनः प्रकारान्तरेण तत्करणसूत्रं वृत्तम्-- फिर और रीतिसे कर्णप्रमाण जानकर कोटि और भुज जाननेकी रीति लिखते हैं एक श्लोकमें- इष्टवर्गेण सैकेन द्विघ्नः कर्णोऽथवा हतः॥ फलोनः श्रवणः कोटिः फलमिष्टगुणं भुजः॥ ७॥ अन्वयः-द्विघ्नः कर्णः सैकेन इष्टवर्गेण हतः कार्य्यः तदा फलोनः श्रवणः कोटिः स्यात्। अथवा इष्टगुणम् फलम् भुजः स्यात् ॥ ७॥ अर्थः-कर्णका दो २से गुणा करे तो जो अङ्क हों उनमें एक युक्त इष्टके वर्गका भाग दे जो लब्धि हो उसको कर्णम घटा दे जो शेष रहे वही कोटिका प्रमाण होगा और कर्णको दोसे गुणाकर जो अंक हों उनमें एक युक्त इष्टके वर्गका भाग देनेसे जो लब्धि हो उस इष्टसे गुणा करनेसे जो गुणनफल हो वही भुजका प्रमाण होता है ॥ ७॥

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( १२८ ) लीलावती । पूर्वोदाहरणे--इस रीतिको पहले उदाहरणमें ही समझना. न्यासः--कर्णः ८५ अत्र द्विकेनेष्टेन जातौ किल कोटिभुजौ ५१ । ६८ चतुष्केण वा । कोटिः ७५ भुजः ४० अत्र४० दोःकोट्यो- नामभेद एवं केवलं न स्वरूपभेदः ॥ फैलाव-जिस क्षेत्रमें कर्णप्रमाण ८५ है, तहां भुज और कोटि जाननेको द्वितीय प्रकारसे कर्ण ८५ को द्विगुण किया तो १७० हुए इसमें एक युक्त इष्ट २ के वर्ग ५ का भाग दिया तब ३४ लब्धि हुए; इनको कर्ण ८५ में घटाया तब ५१ शेष रहे यही कोटिका प्रमाण है । उसी लब्धि ३४ को इष्ट २ से गुणा किया तब यह ६८ भुजका प्रमाण मालूम हुआ तब यह क्षेत्रका आकार हुआ. जब ४ चारको इष्ट माना तब पूर्वोक्त गणित करनेसे कोटि ७५ प्रमाण हुआ, और ४० भुज प्रमाण हुआ; अब यहां यह शंका होती है कि, पहली रीतिके अनुसार ४ चार इष्ट मानकरं कर्ण प्रमाण ८५ होनेपर कोटिप्रमाण ४० और भुजप्रमाण ७५ होता था और इस रीतिसे कोटिप्रमाण ७५ और भुजप्रमाण ४० हो गया; अर्थात् पहली रीतिसे अत्यन्त विरुद्ध हो गया; तहां यह उत्तर है कि, कोटि और भुजमें नाममात्रका ही भेद है; स्वरूपका कुछ भेद है नहीं. अथेष्टाभ्यां भुजकोटिकर्णानयने करणसूत्रं वृत्तम्- दो इष्ट मानकर भुज, कोटि, कर्ण तीनों जाननेकी रीति एक श्लोकमें- इष्टयोगहतिर्द्विघ्नी कोटिर्वर्गान्तरं भुजः ॥ कृतियोगस्तयोरेवं कर्णश्चाकरणीगतः ॥ ८ ॥ अन्वयः-द्विघ्नी इष्टयोः आहतिः कोटिः स्यात् । वर्गान्तरम् भुजः स्यात् । एवं तयोः कृतियोगः अकरणीगतः कर्णः च स्यात् ॥ ८ ॥

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क्षेत्रव्यवहारः। (१२९) अर्थः-दोनों इष्टोंको परस्पर गुणा करके दो से गुणा करे; तब कोटि प्रमाण मालूम होता है. दोनों इष्टोंको वर्ग कर अन्तर करनेसे जो शेष रहे; वह भुजका प्रमाण होता है; दोनों इष्टोंके वर्गका योग करनेसे जो अंक हो अकरणीगत कर्णका प्रमाण होता है ॥ ८ ॥ उदाहरणम्- यैर्यैर्ह्यस्रं भवेज्जात्यं कोटिदोःश्रवणैः सखे ॥ त्रीनप्यविदितानेतान क्षिप्रं ब्रूहि विचक्षण ॥ ५ ॥ अन्वयः-हे विचक्षण ! सखे ! यैः यैः कोटिदोःश्रवणैः जात्यं त्र्यस्रम् भवेत् अविदितान् एतान् त्रीन् अपि क्षिप्रम् ब्रूहि ॥ ५ ॥ अर्थः-हे चतुर मित्र ! जिन जिन कोटि भुज कर्णसे जात्यत्र्यस्र बने, उनको बिना जाने ही तीनोंका प्रमाण शीघ्र कहो ॥ ५ ॥ न्यासः-अत्रेष्टे २ । १ आभ्यां कोटिभुजकर्णाः ४ । ३ । ५ अथवेष्टे २ । ३ आभ्यां कोटिभुजकर्णाः १२ । ५ । १३ अथवेष्टे २ । ४ आभ्यां कोटिभुजकर्णाः १६ । १२ । २० एवमन्यत्रानेकधा. ९

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( १३० ) लीलावती । फैलाव-दो २ और १ एक इष्ट जानकर कोटि, भुज, कर्ण जाननेके लिये उपरोक्त रीति के अनुसार दोनों इष्टोंको परस्पर गुणा किया तब २ दो हुए; इसको दो २ से गुणा किया तब ४ गुणनफल हुआ, यही कोटिप्रमाण है; फिर दोनों इष्टोंके वर्ग ४ । १ का अंतर किया तब ३ तीन शेष रहे; यही भुजका प्रमाण है; तदनन्तर दोनों इष्टोंके वर्ग ४ । १, का योग किया तब ५ पाँच हुए, यही अकरणीगत कर्णका प्रमाण हुआ. जब २ । ३ को इष्टमाना तब पूर्वोक्त रीतिसे दोनों इष्टोंकी परस्पर आहति करी; तब ६ हुए; इनको २ दोसे गुणा किया तब बारह १२ हुए, यही कोटिका प्रमाण है फिर दोनों इष्टोंके ४ । ९ वर्गका अंतर किया तब ५ शेष रहे, यही भुजका प्रमाण है; तदनन्तर दोनों इष्टोंके वर्ग ४ । ९ का योग किया तब १३ हुए; यही कर्णका प्रमाण है. जब २ । ४ को इष्ट माना तब पूर्वोक्त रीतिसे दोनों इष्टोंकी पर- स्पर आहति करी तब ८ हुए; इनकों २ से गुणा किया तब १६ हुए; यही कोटिका प्रमाण है; फिर दोनों इष्टोंके वर्ग ४ । १६ का अन्तर किया तब १२ शेष बचे; यही भुजका प्रमाण है, तदनन्तर दोनों इष्टोके वर्ग ४ । १६ का योग किया तब बीस हुए; यही अकरणीगत कर्णका प्रमाण है, इसी प्रकार जितने इष्ट मानोगे उतने ही अनेक प्रकारके क्षेत्रोंके आकार होंगे ॥ कर्णकोटियुतौ भुजे च ज्ञाते पृथक्करणसूत्रं वृत्तम्- कर्ण और कोटिका योग और भुज जानकर कर्ण और कोटिके पृथक् पृथक् प्रमाण जाननेकी रीति एक श्लोकमें- वंशाग्रमूलान्तरभूमिवर्गो वंशोद्धतस्तेन पृथग्युतोनौ ॥ वंशौ तदर्द्धे भवतः क्रमेण वंशस्य खण्डे श्रुतिकोटिरूपे॥९॥ अन्वयः-वंशाग्रमूलान्तरभूमिवर्गः वंशोद्धतः कार्य्यः तेन वंशौ पृथग्युतोनौ कार्यौ तदर्द्धे वंशस्य खण्डे क्रमेण श्रुतिकोटिरूपे भवतः ॥ ९ ॥ अर्थः-बाँसके अग्र भाग और मूल (जड) भागके मध्यकी पृथ्वीका जो प्रमाण हो उसका वर्ग करनेसे जो अंक हों उनमें बाँसके प्रमाण अर्थात् कर्णकोटिके योगका भाग देनेसे जो लब्धि हो उसको कर्णकोटिके योगमें अर्थात् बाँसके

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क्षेत्रव्यवहारः। (१३१) प्रमाणमें एक स्थानमें जोडै और एक स्थानमें घटावे फिर उन दोनोंका आधा २ करे तब क्रमसे कर्ण और कोटिका प्रमाण मालूम होता है ॥ ९ ॥ उदाहरणम्- यदि समभुवि वेणुर्द्वित्रिपाणिप्रमाणो गणक पवन- वेगादेकदेशे स भग्नः ॥ भुवि नृपमितहस्तेष्वंगलग्नं तदग्रं कथय कतिषु मूलादेष भग्नः करेषु ॥ ६ ॥ अन्वयः-हे गणक ! हे अङ्ग ! यः द्वित्रिपाणिप्रमाणः वेणुः भुवि निखातः सः यदि पवनवेगात् भग्नः तर्हि तदग्रम् भुवि नृपमितहस्तेषु लग्नम् तदा कथय एषः मूलात् कतिषु करेषु भग्नः ॥ ६ ॥ अर्थः-हे प्रिय गणक ! जो बाँस ३२ हाथका पृथ्वीमें गढा है; वह यदि वायुके वेगसे एक जगह टूटा तो उसका अग्रभाग पृथ्वीमें १६ हाथपर जाके लगा तो कहो यह बाँस जडसे कितने हाथ ऊपर टूटा ? ॥ ६ ॥ न्यासः [चित्र: ३२, १२, २०, १६] वंशाग्रमूलान्तरभूमिः १६ वंशः ३२ स एव कोटिकर्णयुतिः ३२ । भुजः १६ जाते ऊर्ध्वाधःखण्डे २० । १२ ॥ फैलाव-यहाँ वंशके अग्रभाग और मूलभागके मध्यभूमिका प्रमाण १६ सोलह ही भुज प्रमाण है और बांसका प्रमाण ३२ ही कोटिकर्णका योग है; अब यहां कोटिकर्ण अलग २ जाननेके अर्थ उपरोक्त रीतिके अनुसार बांसके अग्रभाग और मूलके मध्यकी भूमिके प्रमाण अर्थात् भुज १६ का वर्ग किया तब २५६ हुए; इनमें कर्णकोटिक योग अर्थात् वंशके प्रमाण ३२का भाग दिया तब ८ आठ लब्धि हुए इनको कर्णकोटिक योग ३२ में एक स्थानमें जोडा और एक स्थानमें घटाया तब ४० । २४ हुए; इनको अलग २ आधार किया तब क्रमसे कर्ण और कोटिका प्रमाण २० । १२ हुए अर्थात् कर्णका प्रमाण २० और कोटिका प्रमाण १२ हुआ. आशय CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

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(१३२) लीलावती। यह है कि, वह बांस जडसे १२ हाथ ऊपर टूटा अर्थात् वंशके अग्रभागके और मूलभागके मध्यकी भूमिका प्रमाण तो हुआ भुज और जडसे टूटनेके स्थान तक हुआ कोटिका प्रमाण और टूटनेके स्थानसे अग्रभाग पर्य्यन्त हुआ कर्णका प्रमाण ॥ बाहुकर्णयोगे दृष्टे कोट्याश्च ज्ञातायां पृथक्करणसूत्रं वृत्तम्- भुजकर्णका योग और कोटिका प्रमाण जानकर भुज और कर्णका प्रमाण अलग अलग जाननेकी रीति- स्तम्भस्य वर्गोऽहिबिलान्तरेण भक्तः फलं व्यालबिला- न्तरालात् ॥ शोध्यं तदर्द्धप्रमितैः करैः स्याद्विलाग्रतो व्यालकलापियोगः ॥ १० ॥ अन्वयः-स्तम्भस्य वर्गः अहिबिलान्तरेण भक्तः तदा यत् फलं तत् व्यालबिलान्त- रालात् शोध्यं तदर्द्धप्रमितैः करैः बिलाग्रतः व्यालकलापियोगः स्यात् ॥ १० ॥ अर्थः-स्तंभके प्रमाणका वर्ग करे, जो अङ्क हों उनमें सर्पके बिलके अन्तरका भाग दे; तब जो फल हो उससे सर्प और बिलके अन्तरमें घटा दे, जो शेष रहे उसका आधा कर ले, तब जो अंक रहे उतने ही हाथ बिलसे आगे साँप और मोरका योग होगा ॥ १० ॥ उदाहरणम्- अस्ति स्तम्भतले बिलं तदुपरि क्रीडाशिखण्डी स्थितः स्तम्भे हस्तनवोच्छ्रिते त्रिगुणितस्तम्भप्रमाणान्तरे ॥ दृष्ट्वाऽहिं बिलमाव्रजंतमपतत्तिर्य्यक्स तस्योपरि क्षिप्रं ब्रूहि तयोर्बिलात्कतिमितैः साम्येन गत्योर्युतिः ॥ ७॥ अन्वयः-स्तम्भतले बिलम् अस्ति तदुपरि क्रीडाशिखंडी स्थितः हस्तनवो- च्छिते स्तम्भे स्थितः सः त्रिगुणितस्तम्भप्रमाणान्तरे बिलम् आव्रजंतम् अहिम् दृष्ट्वा तस्य उपरि तिर्य्यक् अपतत् तर्हि तयोः बिलात् कतिमितैः साम्येन गत्योः युतिः जाता इति क्षिप्रम् ब्रूहि ॥ ७ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri

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क्षेत्रव्यवहारः। ( १३३ ) अर्थ:-एक स्तम्भ था, उसके नीचे सांपका बिल (भट्टा) था; स्तम्भपर एक मोर नाच रहा था, जिस स्तम्भपर मोर नाच रहा था वह नौ ९ हाथ ऊंचा था और उससे सत्ताईस हाथ दूसरे अपने बिलमेंको सांप दौडा हुआ आ रहा था; उस समय स्तम्भपर बैठे हुए मोरने देखा कि, सांप आ रहा है; सो उसी समय स्तम्भपरसे उडा और उस सर्पके ऊपरके तिरछा होकर अर्थात् कर्ण गतिसे गिरा; तो कहो कि बिलसे कितने हाथपर जाके मोर और सर्पका योग हुआ ॥ ७ ॥ न्यासः स्तम्भः ९ अहिबिलान्तरम् २७ जाता बिलयुत्योर्मध्यहस्ताः १२ फैलाव-इस उदाहरणमें ९ हाथ ऊंचा स्तम्भ तो कोटि है और सर्प बिलका अन्तर २७ सत्ताईस भुजकर्णका योग है; अब भुज और कर्णका प्रमाण अलग २ जाननेके अर्थ उपरोक्त नियमानुसार स्तम्भ अर्थात् कोटिके प्रमाण ९ का वर्ग ८१ किया; इसमें सर्प और बिलके अन्तर अर्थात् कर्ण और भुजके योग २७ सत्ताईसका भाग दिया तब तीन ३ लब्धि हुए, इसको सर्प और बिलके अन्तर २७ में घटाया तब २४ चौबीस रहे; इनका आधा किया तब १२ बारह हुए; यही भुजका प्रमाण है और शेष १५ पन्द्रह कर्णका प्रमाण है, अर्थात् भुजप्रमाण १२ बारह हाथ बिलसे परे सर्प मोरका योग हुआ ॥ कोटिकर्णान्तरे भुजे च दृष्टे पृथक्करणसूत्रं वृत्तम्- कोटिकर्णका योग और भुजप्रमाण जानकर कोटि और कर्णका अलग २ प्रमाण जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- भुजाद्वर्गितात्कोटिकर्णान्तराप्तं द्विधा कोटिकर्णान्तरेणो- नयुक्तम् ॥ तदर्द्धं क्रमात्कोटिकणौँ भवेतामिदं धीमताऽऽ- वेद्य सर्वत्र योज्यम् ॥ ११ ॥ अन्वयः-वर्गितात् भुजात् कोटिकर्णान्तराप्तं द्विधा कोटिकर्णान्तरेण ऊनयुक्तं कार्यम् तदर्द्धं क्रमात् कोटिकर्णौ भवेताम् । धीमता इदम् आवेद्य सर्वत्र योज्यम् ॥११॥ अर्थः-भुजका वर्ग करके कोटिकर्णके अन्तरका भाग दें; जो फल आवे उसे दो स्थानमें लिखे; एक स्थानमें कोटिकर्णका अन्तर घटा दे और एक स्थानमें जोड दे CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri