भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 404 में से

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( १२८ ) माधवनिदान । अथोन्मादनिदानम् । ――-oo>0<§>0<oo-―― मदयन्त्युद्गता दोषा यस्मादुन्मार्गमाश्रिताः । मानसोऽयमतो व्याधिरुन्माद इति कीर्त्यते ॥ १ ॥ दोष ( वात पित्त कफ ) बढकर अपने २ मार्गको छोड अन्यमार्ग अर्थात् मनोवह धमनियोंमें प्राप्त होकर मनको उन्मत्त करें और यह व्याधि मानसी है अतएव इसको उन्माद ऐसे कहते हैं ॥ एकैकशः सर्वशश्च दोषैरत्यर्थमूर्च्छितैः । मानसेन च दुःखेन स पञ्चविध उच्यते ॥ २ ॥ विषाद्भवति षष्ठश्च यथास्वं तत्र भेषजम् । स चाप्रवृद्धस्तरुणो मदसंज्ञां बिभर्ति च ॥ ३ ॥ अत्यन्त कुपित भये पृथक् पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपात ४ और ५ मानसिक दुःखसे यह रोग पांच प्रकारका और ६ विषखानेसे छठा, इनमें यथादोषानुसार औषध देनी चाहिये, जबतक यह रोग बढे नहीं और जबतक तरुण रहे तबतक इस रोगको मद ऐसे कहते हैं ॥ उन्मादके सामान्य कारण और सम्प्राप्ति । विरुद्धदुष्टाशुचिभोजनानि प्रधर्षणं देवगुरुद्विजानाम् । उन्मादहेतुर्भयहर्षपूर्वो मनोऽभिघातो विषमाश्च चेष्टाः ॥ ४ ॥ तैरल्पसत्त्वस्य मलाः प्रदुष्टा बुद्धेर्निवासं हृदयं प्रदूष्य । स्रोतांस्यधिष्ठाय मनोवहानि प्रमोहयन्त्याशु नरस्य चेतः ॥ ५ ॥ विरुद्ध दुष्ट कहिये जहर मिला अन्न आदि, अशुचि चाण्डालादिसे स्पर्श करा ऐसा भोजन, देवता, गुरु, ब्राह्मण इसका तिरस्कार करनेसे, भय और हर्षके होनेसे मनको बिगाड सब चेष्टा विपरीत करे अर्थात् टेढा तिरछा चले, बलवान्से वैर करे, बकने लगे । इस श्लोकमें पूर्वशब्द कारणका है और चकारसे काम क्रोध लोभादिक भी उन्माद रोगके कारण हैं यह जैज्जटका मत है । इनमें कहे जो कार- णोंसे अल्प सत्त्वगुणवाले पुरुषके वातादिक दोष कुपित होकर बुद्धिका निवासस्थान ( रहनेका ठिकाना ) जो हृदय उसको बिगाड मनके बहनेवाले स्रोतोंमें प्राप्त हो मनुष्यके अन्तःकरणको मोहित करें ॥ १ उत् ऊर्ध्वं हृदयं गता दोषा मदयन्ति मनोविभ्रमं कुर्वन्तीत्युन्मादः ॥