भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 404 में से

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भाषाटीकासमेत । ( १२९ ) उन्मादका स्वरूप । धीविभ्रमः सत्त्वपरिप्लवश्च पर्याकुला दृष्टिरधीरता च । अबद्धवाक्यं हृदयं च शून्यं सामान्यमुन्मादगदस्य चिह्नम् ॥ ६ ॥ बुद्धिमें भ्रम, मनका चञ्चल होना, दृष्टिका सर्वत्र चलना, अधीरजपना ( डर- पना ); कुछका कुछ बोलना, हृदय शून्य हो जाय ( अर्थात् विचार शक्तिका नाश होना ) ये उन्मादरोगके सामान्य लक्षण हैं ॥ विशेष लक्षण । रूक्षाल्पशीतान्नविरेकधातुक्षयोपवासैरनिलोऽतिवृद्धः । चिन्तादिदुष्टं हृदयं प्रदूष्य बुद्धिं स्मृतिं चापि निहन्ति शीघ्रम् ॥७॥ अस्थानहासस्मितनृत्यगीतवागङ्गविक्षेपणरोदनानि । पारुष्यकाश्यर्यारुणवर्णता च जीर्णे बलं चानिलजस्वरूपम् ॥ ८ ॥ रूखा, थोडा और शीतल ऐसा 'अन्नविरेक' इस शब्दसे इस जगह दस्त और वमन जानना, धातुक्षय और उपवास इन कारणोंसे अत्यन्त बढी जो वायु सो चिन्ता शोकादिकरके युक्त होकर हृदयको अत्यन्त दुष्टकर बुद्धि और स्मरण इनका शीघ्र नाश करे और हँसनेके कारण विना हँसे ( मन्दमुसकान करे ) नाचे, बिना प्रसंगके गीत और बोलना करे, हाथोंको सर्वत्र चलावे, रोवे और शरीर रूखा तथा कृश और लाल हो जाय और आहारका परिपाक भयंकर ज्यादा जोर होय ये वातज उन्मादके लक्षण हैं ॥ पित्तज उन्मादके कारण और लक्षण । अजीर्णकट्वम्लविदाह्यशीतैर्भोज्यैश्चितं पित्तमुदीर्णवेगम् । उन्मादमत्युग्रमनात्मकस्य हृदि स्थितं पूर्ववदाशु कुर्यात् ॥ ९ ॥ अमर्षसंरंभविनग्नभावाः सन्तर्जनाभिद्रवणौष्ण्यरोषाः । प्रच्छायशीतान्नजलाभिलाषः पीतास्यता पित्तकृतस्य लिङ्गम्॥१०॥ अधकच्ची, कडवी, खट्टी, दाह करनेवाली और गरम ऐसी २ वस्तु भोजन कर- नेसे संचित भया जो पित्त सो तीव्रवेग होकर अजितेन्द्रिय पुरुषके हृदयमें प्रवेश कर पूर्ववत् अति उग्र उन्माद तत्काल उत्पन्न करे । इस उन्मादसे असहनशील, हाथ पैरोंको पटकनेवाला, नग्न हो जाय, डरपे, भाजने लगे, देह गरम होजाय, क्रोध करे, छायामें रहे, शीतल अन्न और शीतल जल इनकी इच्छा, पीला मुख होजाय ये लक्षण पित्तज उन्मादके हैं ॥ ६

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