भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( १७५ ) वान् होय तो चिकित्सा करनी चाहिये और द्विदोष बलवान् वा त्रिदोष बलवान् होयँ तो चिकित्सा न करे ॥ सन्निपातगुल्मके लक्षण । महारुजं दाहपरीतमश्मवद्घनोन्नतं शीघ्रविदाहदारुणम् । मनःशरीराग्निवलापहारिणं त्रिदोषजं गुल्ममसाध्यमादिशेत् ॥ १४॥ भारी पीडा करनेवाला, दाहकरके व्याप्त, पत्थरके समान कठिन तथा ऊंचा और शीघ्र दाहकरके भयंकर, मन, शरीर, अग्नि और बल इनका नाश करनेवाला अर्थात् मनको विकल करनेवाला, शरीरको कृश करनेवाला और विवर्ण करनेवाला, अग्नि- वैषम्यादिकारक, असामर्थ्य करनेवाला, ऐसा त्रिदोषज गुल्म असाध्य जानना ॥ रक्तगुल्मके लक्षण । नवप्रसूताऽहितभोजना या या चामगर्भं विसृजेदृत्तौ वा । वायुर्हि तस्याः परिगृह्य रक्तं करोति गुल्मं सरुजं सदाहम् ॥ १५ ॥ पैत्तस्य लिङ्गेन समानलिङ्गं विशेषणं चाप्यपरं निबोध । यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैश्चिरात्सशूलः समगर्भलिङ्गः ॥ स रौधिरः स्त्रीभव एव गुल्मो मासे व्यतीते दशमे चिकित्स्यः॥१६॥ नई प्रसूत भई स्त्रीके अपथ्य सेवन करनेसे, अथवा अपक्व गर्भपात होनेसे अथवा ऋतुकालके समय अपथ्य भोजन करनेसे वायु कुपित होकर उस स्त्रीके रुधिर ( जो ऋतुसमय निकले उस ) को लेकर गुल्म करे । वह गुल्म पीडायुक्त दाहयुक्त होय और पित्तगुल्मके जो लक्षण कहे हैं वे सब इसमें होजाते हैं और इसमें दूसरे विशेष लक्षण होते हैं, उनको कहता हूं सुनो-यह गुल्म बहुत देरमें गोल गोल हिलै, अवयव कहिये हाथ पैरके साथ नहीं हिले शूलयुक्त होय, गर्भके समान सब लक्षण मिले अर्थात् मुखसे पानी छूटे, मुख पीला पडजाय, स्तनका अग्रभाग काला होजाय और दोहदादि लक्षण सब मिलें, ये सब लक्षण व्याधिके प्रभावसे होते हैं । जैसे क्षय रोगवालेको स्त्रीरमणकी इच्छा और काले नख ताल्वादिक होते हैं । यह रक्तजगुल्म स्त्रियोंके होय है, दश महीने व्यतीत होजायँ तब इस रक्तगुल्मकी चिकित्सा करनी चाहिये । कोई कहते हैं कि, यह गर्भ है अथवा रक्तगुल्म है, यह शंका जानकर माधवाचार्यने ( दश महीने व्यतीत होने- पर ) ऐसा कहा है, कारण इसका यह है कि, नववां और दशवां महीना यह प्रसूत होनेका समय है। शंका-क्यों जी ! “ यः स्पन्दते पिंडित एव नांगैः ” इत्यादिक

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