माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( १७७ ) बचे नहीं । श्वास, शूल, प्यास, अन्नमें अरुचि और गुल्मकी गांठका एकाएकी नष्ट होजाना और दुर्बलता ये लक्षण होनेसे जानना कि, गुल्मरोगवालेकी मृत्यु समीप है। शंका-क्यों जी ! अन्तर्विद्रधि और गुल्मरोग इनमें क्या भेद है। इन दोनोंके स्थान और स्वरूप तौ एकसे हैं फिर भेद क्या है ? उत्तर-तुमने कहा सो ठीक है अन्तर्विद्रधि पचता है गुल्म नहीं पचे है इसका कारण यह है कि गुल्म तो निराश्रय है। सो सुश्रुतने कहा भी है-- न निबन्धोऽस्ति गुल्मस्य विद्रधिः सनिबन्धनः । गुल्मस्तिष्ठति दोषे स्वे विद्रधिर्मांसशोणिते ॥ विद्रधिः पच्यते तस्माद्गुल्मश्चापि न पच्यते ॥ २१ ॥ गुल्मका निबंध नहीं और विद्रधिका निबंध है, गुल्म अपने दोषोंमें रहता है और विद्रधिका ठिकाना मांस रुधिरमें है, इसीसे विद्रधिका पाक होय है और गुल्मका पाक नहीं होय ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरी- भाषाटीकायां गुल्मरोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ हृद्रोगनिदानम् । अत्युष्णगुर्वम्लकषायतिक्तैः श्रमाभिघाताध्यशनप्रसङ्गैः । संचिन्तनैर्वेगविधारणैश्च हृदामयः पञ्चविधः प्रदिष्टः ॥ १ ॥ अतिगरम, अतिभारी, अतिखट्टा, अतिकषैला, अतिकडुवा ऐसे पदार्थ सेवन करनेसे, श्रम ( धनुष आदिका खैंचना ) अभिघात ( हृदयमें चोट लगना ) और भोजनके ऊपर भोजन नित्य करनेसे, संचिंतन ( राजाके भयसे चिन्ता ), मल मूत्र आदि वेगोंके रोकनेसे, वातादिकके क्षयसे और सन्निपातकरके तथा कृमिसे हृदयका रोग होता है, वह पांच प्रकारका है ॥ हृद्रोगकी सम्प्राप्ति और सामान्य लक्षण । दूषयित्वा रसं दोषा विगुणा हृदयं गताः । हृदि बाधां प्रकुर्वन्ति हृद्रोगं तं प्रचक्षते ॥ २ ॥ कुपित भये दोष रसको ( जो कि हृदयमें रहता है), दुष्ट करके हृदयमें अनेक प्रकारकी पीडा करे उसको हृदयरोग कहते हैं ॥