भारतकोश
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( १७९ ) है कि, उत्क्लेशसे लेकर तमपर्यन्त त्रिदोषके लक्षण कहे हैं। जैसे तोद, शूल ये वादीसे होयँ । उत्क्लेश, हल्लास और ष्ठीवन ये कफसे और तम यह पित्तसे लक्षण होता है और अरुचिसे लेकर शोषपर्यन्त कृमिज हृद्रोगके लक्षण जानने । इस विषयमें प्रत्येक आचार्योंके भिन्न २ मत हैं ॥ सर्वोके उपद्रव । क्लोम्नः सादो भ्रमः शोषो ज्ञेयास्तेषामुपद्रवाः । कृमिजे कृमिजातीनां श्लैष्मिकाणां च ये मताः ॥ ७ ॥ क्लोम कहिये पिपासा ( प्यास ) के स्थान उसमें ग्लानि होय, भ्रम, शोष ये सब उन हृद्रोगोंके उपद्रव जानने और कफकी कृमिरोगके जो पिछाडी कह आये हैं सोई कृमिज हृद्रोगोंके लक्षण होते हैं । तथा “ हल्लासमास्यस्रवणमविपाकमरोच- कम् ।” इत्यादि ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां हृद्रोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ मूत्रकृच्छ्रनिदानम् ।

व्यायामतीक्ष्णौषधरूक्षमद्यप्रसंगनित्यद्रुतपृष्ठयानात् । आनूपमांसाध्यशनादजीर्णात्स्युर्मूत्रकृच्छ्राणि नृणामिहाष्टौ ॥ १॥ व्यायाम ( दण्डकसरत आदि ), तीक्ष्णौषध ( राई आदि ) रूखा पदार्थ और नित्यप्रति मद्यपान करना इनसे और निरन्तर घोडेपर चढनेसे और जलसमीप रह- नेवाली पक्षी ( हंस, सारस, चकवां, आदि) का मांस खानेसे, भोजनके ऊपर भोजन करनेसे और कच्चे पदार्थ इत्यादिकोंके खानेसे मनुष्योंके आठ प्रकारका मूत्रकृच्छ्र रोग होता है। पृथक् दोषोंसे ३, सन्निपातसे १, चोट लगनेका १, मल रोकनेका १, वीर्य रोकनेका १ और पथरीका १ ये सब मिलकरके आठ भये ॥ मूत्रकृच्छ्रकी सम्प्राप्ति । पृथङ्मलाः स्वैः कुपिता निदानैः सर्वेऽथवा कोपमुपेत्य बस्तौ । मूत्रस्य मार्गं परिपीडयन्ति यदा तदा मूत्रयतीह कृच्छ्रात् ॥ २ ॥ अपने अपने कारणोंसे कुपित भये जो वातादिक सब अलग दोष बस्तीमें कुपित होकर मूत्रके मार्गको पीडित करें, तब मनुष्यके बडे कष्टसे मूत्र उतरे ॥

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